शुक्रवार, 5 जून 2015

अशरीरी मन


05 June 2015
19:03

-इंदु बाला सिंह

टूटता है
जुड़ता है
बिखरता है
सिमटता है
पारे सा है मन
पकड़ में
न आये
हाथ से
कितना अजीब सा है
यह अशरीरी मन  |

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