24 June
2015
10:47
-इंदु बाला
सिंह
माँ और
मिट्टी को छोड़
चले जाता है
नौकरीपेशा
दूर
जीने के लिये
और
उनकी खुशबू
कभी
पुकारती है
तो
कभी राह दिखती
है उसे ......
नौकरीपेशा को
कभी कभी उदासी
के पलों में
अपने झरोखे से
मुस्काती माँ
और मिट्टी भी दिख जाती है ....................
' कर्म ही
जीवन है ' की नसीहत बंधी गाँठ के गमछे से पोंछ अपने श्रम का पसीना
नौकरीपेशा
धन्यवाद देता है
अपने समय को
कम से कम अपने
सहपाठियों की तरह
वह
बेरोजगार तो
नहीं है |
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