02 July
2015
07:18
-इंदु बाला
सिंह
गाँवों से
दूर महानगर में
संतति के
लिये
माँ
ही एक विशाल जंगल है .......प्रकृति है
हर संतति जिसके
मैदान
में बकैयियाँ चलती है ... दौड़ लगाती है
पहाड़
पर पर्वतारोहण करती है कभी पीठ पर गमछे
में बंध कर .... कभी अपने पावों से
सरिता में
छ्पप्क छांयी खेलती है ...कभी सुनहरी मछली सरीखी तैरती है
विशालकाय
वृक्ष की डाली में झूला झूलती है .... कभी टहनियों में लुकाछिपी खेलती है |
संतति
मुस्काती है
....हंसती है
और
उसके संग संग
माँ गमकती है .....
हर माँ का घर एक विद्यालय होता है .... उर्जा का श्रोत होता है |
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