17 July 2015
22:14
-इंदु बाला सिंह
वह
आशावादी थी
वह घर के ठूंठ को
हर दिन पानी देती थी
आशा भरे
मन से ........
शायद
कल निकलेगी फुनगी
पर
हर सुबह
उसे अफ़सोस होता था
देख के
उस ठूंठ को ........
वह तो
जस का तस चल फिर रहा है ........
अब
उसे आंधी का इन्तजार था
जिसके आने पर
या तो ठूंठ उखड़ जाता जड़ समेत
या
वह खुद |
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