30 July
2015
07:42
-इंदु बाला
सिंह
ठगेंगे
अपने
.......
खोल मन की
आंखें
ओ
रे मानव !
मत पटक दोष
किसी
अदृश्य शक्ति पे ........
जरा पढ़े ले
प्यारे
तू अपनों को
अपने मित्रों
को
अपने
पड़ोसियों को ........
तेरी औलाद
पिल्ला नहीं
जिसे
तूने दिया छोड़
कर के पैदा
...............
अरे !
ओ इंसान !
कर्म कर
नसीब ले कर
नहीं होता पैदा कोई .........
नसीब तो लिखता
है
हर जन्मदाता
अपनी सन्तान
का ...........
हर रोज
वह पिलाता है
घुट्टी
उसे अपने कर्म
की |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें