गुरुवार, 7 मई 2015

उड़ गयी अबोधता


08 May 2015
11:17


-इंदु बाला सिंह 


क्या दिन थे
वे
स्वप्नीले
दूर थे
हम
बेईमानी से
छल से
पराये तो ठगते ही हैं
पर
देखे हमने
अपनों के रंग बदलते रूप
ऐसा क्यों ?
इतनी इर्ष्या क्यों ?
इतना स्वार्थ क्यों ?
इतना नशा क्यों सम्पत्ति का
जब
छूट ही जायेगा सब
यहीं पर .........
यथार्थ के तपते धरातल पर
चलते चलते
ऐसे जहां में पहुंचे हम
कि
उड़ गयी अब तो अबोधता
इन्द्रधनुष मन नहीं मोहते
बादल की गरज , बिजली की चमक से जी न डरे अब
बल्कि
उनके जन्म का कारण कौंधे मन में
आज यूं लगे
मानो मन वैज्ञानिक हो गया है
खाली ढूंढता है कारण
बदले कल का
और
आज के समय का | 

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