शनिवार, 5 दिसंबर 2015

काश ! शीत निद्रा से जग जाता मन



- इंदु बाला सिंह

काश !
लौटते बीते दिन
तो
हम आज भी मुस्काते
और
हो के निश्चिंत
बांधे रहते
हम
अपनी मुट्ठी में
अपना मनचाहा आकाश
काश !
शीत निद्रा से जग  जाता
सोया मन मेरा । 

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