गुरुवार, 30 जुलाई 2015

अभाव उपहार है


31 July 2015
07:08


-इंदु बाला सिंह



झुक जाता है
हर याचक
दान के बोझ से .......
मत करना
तू कभी याचना
क्योंकि तेरी ही मुट्ठी में
है बंधी
तेरे नसीब की मुस्कान ........
आभावग्रस्त
सदा बढ़ता ही जाता है .........आगे ही आगे
मन मृदंग बजाते बजाते ........
सुन प्यारे !
उपहार है
अभाव
अदृश्य शक्ति का इंसान को
जिसने समझा
पार कर लिया भवसागर उसने |

बुधवार, 29 जुलाई 2015

मत मुकरना जुबान से


30 July 2015
08:42

-इंदु बाला सिंह


सब कुछ तोड़ना
पर
आशा दे के
मत मुकरना अपनी जबान से ........
रो देगी
मानवता .......
ओ सबल इंसान |

खुशी के आंसू हैं


30 July 2015
08:27

-इंदु बाला सिंह

छुपाने के लिये
अपनी पनियाई आंखें
उसने
क्या खूब बहाना ढूंढा था ........
ये खुशी के आंसू हैं यारों |

कलाम ! तुम्हें प्रणाम


28 July 2015
07:04

-इंदु बाला सिंह


स्वाभिमानी
स्वावलंबी
छात्रों का पथ प्रदर्शक
वैज्ञानिक
प्रोफेसर
भारत का मिसाईल मैंन
क्या क्या नाम दूं तुम्हें
ओ महान !
डा० ए० पी० जे० अब्दुल कलाम
अंतिम दम तक
रहे तुम
छात्रों के संग ........
कर गये
तुम
गौरान्वित
छात्रों को ...............
नाम कर दिया रौशन
तुमने
अपने जन्मदाता का .......
तुम्हें
आज
हर छात्र करे ...
शत शत प्रणाम .....शत शत प्रणाम |

कर्म की घुट्टी


30 July 2015
07:42


-इंदु बाला सिंह


ठगेंगे
अपने .......
खोल मन की आंखें
ओ रे मानव !
मत पटक दोष
किसी अदृश्य शक्ति पे ........
जरा पढ़े ले
प्यारे
तू अपनों को
अपने मित्रों को
अपने पड़ोसियों को ........
तेरी औलाद पिल्ला नहीं
जिसे
तूने दिया छोड़
कर के पैदा ...............
अरे !
ओ इंसान !
कर्म कर
नसीब ले कर नहीं होता पैदा कोई .........
नसीब तो लिखता है
हर जन्मदाता
अपनी सन्तान का ...........
हर रोज
वह पिलाता है
घुट्टी
उसे अपने कर्म की |

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

दोपहर में दो बजे से तीन बजे


22 July 2015
07:26

- इंदु बाला सिंह

ऐसा कब होगा ?......
कितनी मस्ती होगी
अहा !
मजा ही मजा !
हम सब सोयेंगे बिना डिस्टर्बेंस के
दो बजे से पांच बजे तक
सरकार मम्मी पापा को भी डांट कर सुला देगी |

हीरे जड़ी सुनहली अंगूठी जैसा सूर्य ग्रहण


22 July 2015
08:03

- इंदु बाला सिंह

कितनी अद्भुत है
यह अंगूठी
ललक कर बोली बिटिया मेरी
मुझे चाहिये...
यही अंगूठी
नानी मुस्काई .......
ओ नन्ही परी !
रुक जा
देखना आयेगा एक दिन तेरा राजकुमार
तुझे पहनायेगा यही अंगूठी
मेरी बिटिया देखती रही सपनीली आंखों से
अपनी
काल्पनिक हीरे जड़ी सुनहली अंगूठी |

हंस के जियो यारो


22 July 2015
15:54


-इंदु बाला सिंह

आंचलिक गीत बज रहे थे
ऊंची आवाज में
पास से ही आ रही थी आवाज
आदिवासी गीत किसके घर बज रहा है ....
उत्सुकता हुयी .......
बाहर दिखा ट्रक की छत पे बैठा दुबला पतला कंधे पे गमछा डाला युवा
उसके हमउम्र चार युवा उतार रहे थे
तेजी से ट्रक पर लदा इंटा
थोड़ी देर में
चला गया ट्रक
पर
सिखा गया वह ट्रक ड्राईवर
जिन्दादिली ........
जब तक जियो हंस के जियो यारो |

ब्लैक होल सरीखे रिश्ते


24 July 2015
12:05


-इंदु बाला सिंह

हमारे रिश्ते
वैज्ञानिक और ब्लैक होल सरीखे थे
मैं पाठक था
और
वह साहित्य
मेरा समय धीमी गति से चल रहा था
मैं खुश था
तभी निगोड़ा चश्मा टूट गया |

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

रोशनी की आस


21 July 2015
23:10

-इंदु बाला सिंह


युवा
आशा भरी आखों से देख रहे हैं
सडकों को 
पोस्को कब खुलेगा ?
हमारी सड़कें जगर मगर करेगी रोशनी से
बड़ी बड़ी दुकानें खुलेगी
अस्पताल और स्कूल खुलेगा
हमें कमाने
अपने गांव से दूर नहीं जाना पड़ेगा ......
और
युवाओं के संग
उनके बच्चे भी बड़े हो रहे हैं
बच्चे
स्कूल खाना खाने जा रहे हैं ......
खेतों में दौड़ लगा रहे हैं ..........
अंधियारे में सडकों पर गुजरती कारें देख रहे हैं |


कवि गरीब हो रहा है


21 July 2015
13:12

-इंदु बाला सिंह

अनुभूतियों में
बोरिंग कर निकालता
कवि 
क्रूड आयल ........
रेट कितना गिर गया है !
रचना का
अब तो
उसकी लागत ही नहीं निकलती ........
कवि
धीरे धीरे
और गरीब हो रहा है |

सोमवार, 20 जुलाई 2015

निरुद्देश्य भटकन


21 July 2015
10:47

-इंदु बाला सिंह

मन
क्या तू
उर्वर हो रहा है !
बंजर हो रहा है !
या
धरती पर
ऋतू परिवर्तन हो रहा है
यूँ लगता है
जा रही हूं निरुद्देश्य ........
कभी कभी
भटकन सी महसूस होने लगती है
न जाने क्यूं |


शनिवार, 18 जुलाई 2015

ट्यूशन आंटी की कीमत


18 July 2015
22:57

-इंदु बाला सिंह

घरों के
हर दिन बारह काम करनेवाली
कामवाली
पाती थी
एक काम के पांच सौ रूपये
हर महीने ..........
घर में
छूटे उसके
दो छोटे बच्चे
एक दिन ऐसा लड़े
कि
सिर फूट गये छोटे भाई का
और
उस दिन कामवाली को समझ आया 
अपने बस्ती की
ट्यूशन आंटी की कीमत
जो
बच्चों को
महीने के पचास रूपये ले कर
हर दिन
तीन घंटे  पढ़ाती  थी
काश !
वह भी अपने बच्चों को
ट्यूशन आंटी के पास छोड़ कर गयी होती
काम पे |

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

आंधी तो आयेगी ही



17 July 2015
22:14

-इंदु बाला सिंह

वह
आशावादी थी
वह घर के ठूंठ को
हर दिन पानी देती थी
आशा भरे
मन से ........
शायद
कल निकलेगी फुनगी
पर
हर सुबह
उसे अफ़सोस होता था
देख के
उस ठूंठ को ........
वह तो
जस का तस चल फिर रहा है  ........
अब
उसे आंधी का इन्तजार था
जिसके आने पर
या तो ठूंठ उखड़ जाता जड़ समेत
या
वह खुद |

जेनेरेशन का धागा


17 July 2015
18:59


-इंदु बाला सिंह

जिम्मेवारी
जिस पल समझ ली गयी
मजबूरी
बंधे रहने की
उसी पल टूट गया
धागा
दिलों को
जोड़नेवाला ...........
अब
वे दूर थे
एक दुसरे से
पास रह कर भी |

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

तुम कौन हो


17 July 2015
09:56

-इंदु बाला सिंह

प्यारा है
तुम्हें
मेरा हर दुश्मन ....
मेरे अपनों को
तुम
जबरन
बहला कर
फुसला कर
घसीटना चाहते हो
अपने
अभिलाषित स्थान में ........
तुम कौन हो ?
मेरे पास रह कर भी
इतने
अजनबी कैसे
हो गये
तुम |


रविवार, 12 जुलाई 2015

घर की एक राजदुलारी


07 July 2015
22:38

-इंदु बाला सिंह

पोस्ट ग्रजुयेट का परीक्षाफल फर्स्ट क्लास निकला
और
मोहल्ले की प्यारी
माँ बाप की
लक्ष्मी स्वरूपा बिटिया
न जाने क्यों
एक दिन सुना मैंने ...............
गायब हो गयी
अपने इंजीनीयर ब्वाय फ्रेंड के साथ ........
चेहरा काला हो गया था
अपमान से
जन्मदाता का ...........
माना फिर जुड़ गया सम्बन्ध बिटिया से फिर
पर
आजीवन हरा रहा
वह घाव
जो
अपने स्वाभिमानी माता पिता को दे कर
अपना घर बसा ली थी
घर की
एक राजदुलारी |

रोशनी तलाशूँ मैं


10 July 2015
16:42

-इंदु बाला सिंह 

जहां जगह मिली
वहीं स्टडी रूम बन गया
रोशनी तलाशूँ
मैं
सूरज की |

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

भूल चली आनेवाला कल


09 July 2015
13:32

-इंदु बाला सिंह


बसी जब से
समन्दर किनारे
रात में
वह अपनी आवाज से डराने लगा
याद आये
भूत प्रेत
और
सुनामी
भयभीत हो
भूल चली
मैं
आनेवाला कल
और
देखते ही देखते
रात में
अच्छी नींद आने लगी |

बुधवार, 8 जुलाई 2015

ज्ञान की शीतल हवा


09 July 2015
11:11

-इंदु बाला सिंह


अंतर्मन चटकता नहीं है ......
गल जाता है
पढ़ विभाजन की कहानियां
परिवार का विभाजन हो
या
सम्बन्धों का विभाजन
अलगाव
तो अलगाव ही है
विश्व बंधुत्व कहाँ छुपा है
किशोर मन है सोंचता ................
क्या हम स्वार्थी नहीं बन रहे !
दोषारोपण से
मेरा दोष कम नहीं होता .............
जुड़ाव में
है सकारत्मक शक्ति
और
अलगाव में है नकारात्मक शक्ति
शक्ति तो दोनों प्रक्रिया दे ..............
स्वार्थ की
नकारात्मक गर्मी .......
घाव .......
दे हमें कैंसर  
तो क्यों न हम खुद का तन शीतल करें
ज्ञान की शीतल हवा से |

अद्भुत सेनानी


09 July 2015
07:26

-इंदु बाला सिंह

बाँध
पीठ पर पुत्र और पुत्रियां
वह
निकल पड़ी थी एक दिन ...............
और
भीड़ गयी थी
वह समय से लक्ष्मीबाई सरीखी
थाम
हाथ में हथियार
चली
करने साबित कलम की शक्ति
वह अद्भुत सेनानी ............
और
भिड़ंत हुयी
उसकी
अपनों से ...........
परायों से .............
समस्या के बादलों में
खामोश चमक बरस जाती थी
वह अद्भुत सेनानी सब अवरोधक पर ..........
देखते ही रह जाते थे
हो मौन
निकटस्थ उसे
अपने ड्राइंग रूम के झरोखे से ........
माना
एक दिन जीत लिया उसने
खेती लायक क्षेत्र
पर
एक शाम
अनुभव हुआ उसे ............
सेनानी तो आजीवन सेनानी रहता है
और
तब से वह
सदा दौरा करती रहती है
अपने इलाकों का |

सोमवार, 6 जुलाई 2015

रोपे गये पौधे



07 July 2015
07:05

-इंदु बाला सिंह



लड़की रोपते हैं
हम
अपनी चाहरदीवारी में ......
कालान्तर में
विशाल फलदार वृक्ष बन जाती है वह .............
कभी कभी
वह बरगद भी बन जाती है .........
हैरत होती है ........
एक जगंह से
उपार कर
घरों में रोपे गये चारा को
अपनी मिट्टी से कटने के बाद भी
इतना विशाल बनते देख  |

भींगा पन्ना


06 July 2015
17:12

-इंदु बाला सिंह

बादल
उमड़ घुमड़ ......
टकराते हैं
जब जब पहाड़ से ..........
भींग जाता है मन का पन्ना
शब्दों की बारिश से |

रविवार, 5 जुलाई 2015

मानवी और चिड़िया


06 July 2015
11:47

-इंदु बाला सिंह

काश !
वह चिड़िया होती !
पेड़ पर घोंसला बनाती चिड़िया को देख
सोंचा उसने  ........
पर
उसे तो
अपना मकान बनाना किसीने सिखाया ही नहीं
बस
एक मकान से उठा कर
बैठा दिया किसी दुसरे मकान में .............
आजीवन वह अहसानमंद रही
अपने मकानमालिक का  
बारम्बार जीती रही मरती रही वह
दुसरे के मकान में
अपमानित हो कर  भी ........
शायद यही उसके दैव को मंजूर था
वह मानवी थी न |


बुधवार, 1 जुलाई 2015

महानगर में माँ ही प्रकृति है


02 July 2015
07:18


-इंदु बाला सिंह


गाँवों से दूर महानगर में
संतति के लिये
माँ ही एक विशाल जंगल है .......प्रकृति है
हर संतति जिसके
मैदान में बकैयियाँ चलती है ... दौड़ लगाती है
पहाड़ पर पर्वतारोहण करती है कभी पीठ पर गमछे में बंध कर .... कभी अपने पावों से
सरिता में छ्पप्क छांयी खेलती है ...कभी सुनहरी मछली सरीखी तैरती है
विशालकाय वृक्ष की डाली में झूला झूलती है .... कभी टहनियों में लुकाछिपी खेलती है |
संतति
मुस्काती है ....हंसती है
और
उसके संग संग माँ गमकती है .....
हर माँ का घर एक विद्यालय होता है .... उर्जा का श्रोत होता है |