गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

एक ख्वाब इन्कलाब का


14 February 2015
07:18
-इंदु बाला सिंह


रस्सी तो अब बस टूटने को है
अकेले हो रहे हैं हम धीरे धीरे सुविधा के नाम पे
सास को बहु से आकांक्षा है ........
बहू को अपने माता पिता से अथाह प्यार है .......
मैं कोई सामान नहीं जिसे दान कर स्वर्ग में सीट सुरक्षित करा लो तुम ........
क़ानून झलक दिखलाता है
फिर
अव्यवस्था के बादल में छुप जाता है
माँ , बेटी , बहु रिश्ते कपूर सरीखे उड़ चुके हैं
हम कहां जा रहे हैं ..........
ये कैसा इन्कलाब आ रहा है ..............
न जाने क्यों
हम संस्कृति की जयकार करते हुये  इन्कलाब को गले लगा रहे हैं
छलावे इन्कलाब के सपनीले इन्द्रधनुष को अपनी पहचान बनाने को हम आतुर हैं
यूं लगता है ........
हम बस बहे जा रहे हैं
न जाने क्यों हम समय को मुट्ठी में बांधने की ताकत खोते जा रहे हैं |

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