सोमवार, 2 अप्रैल 2012

विद्यार्थी


विद्यार्थी सा सच्चा इंसान नहीं
पिता  सी  बड़ी   छाँव   नहीं |

माता  वृक्ष  न बन पाती
तोड़ लेते लोग उसकी पत्ती |
रोती स्त्री देख  लगता अच्छा
और देख प्यार बांटती  माता |

दूरदर्शन हमें  हमें  पढ़ाता
रोते बच्चे महिलाएं दिखाता |
हमें प्रफुल्लित  करता वह
हमें समाज का रूप दिखाता |

नयी पौध सोंच पाती
सदा ठगी सी  सोंचती |
जहाँ हम थे कल खड़े
वहीँ  देखते उन्हें आज खड़े |

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