विद्यार्थी सा सच्चा इंसान नहीं
पिता सी बड़ी छाँव नहीं |
माता वृक्ष न बन पाती
तोड़ लेते लोग उसकी पत्ती |
रोती स्त्री देख लगता अच्छा
और देख प्यार बांटती माता |
दूरदर्शन हमें हमें पढ़ाता
रोते बच्चे महिलाएं दिखाता |
हमें प्रफुल्लित करता वह
हमें समाज का रूप दिखाता |
नयी पौध सोंच न पाती
सदा ठगी सी सोंचती |
जहाँ हम थे कल खड़े
वहीँ देखते उन्हें आज खड़े |
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