मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

रुका पल


स्वयं को पहचानिये
परहित कार्य कीजिये |
सर्वप्रिय कहलायिये 
दूसरों को न देखिये |
अपना कार्य कीजिये
फौलाद बन जाईये |

कर्म ही पहचान है
शान है आपकी यहाँ |
बस चलते जाईये
नए कर्म तलाशिये |
कर्महीन गिर गया
सबकी निगाह से ही |

आप मरे उसी पल
जब निकम्मे बने |
उठिए साँस लीजये
क्यूँ आसरा देखते |
चलनेवाला ही प्यारा 
रुका बस गया पूजा | 

पूजनीय बने तो क्या
जहाँ स्व ही  मृत है |
भले   डगमगायिये
अपनी पहचान बने |
और आपको तलाशे
कुछ ऐसा करें अब |

कोई नहीं है आपका
आप अपने हैं साथी |
शान करें  खुद  पर
जन्मे इस धरा पर |
देख आपकी खुद्दारी
लोग  कसमसायेंगे |

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