आइये ! जरा विचारें हम
उन गृहणियों के श्रम के मूल्य के बारे में
उसका मूल्य अनमोल है कह कर बचा नहीं जा सकता |
वे बच्चे पैदा करती हैं
पालती हैं
घर के लिए बाहर जा कर छोटे संस्थानों में कमाती भी हैं |
वे कांच की छत तले
कांच की दीवारों से घिरी
काला धन हैं जिसका सरकारी खाते में हिसाब नहीं |
कब खुलेंगे ये खाते ?
कब आएगा उनके खातों में
उनका अपना पैसा
यह एक पुराना मुद्दा है हर बार नए तरीके से नए साल में |
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