बदलते समय के साथ
हम न बदले
तो छूट जायेंगे अपनों से |
जो छूटा उसे क्या याद करे
क्यूँ याद करे
जब साथ न निभा पाए वे |
यादों पर दुनियां चलती
तो कबका
यादों का शहर बस गया होता |
बदलाव ही यात्रा है
प्रकृति से सीखें हम
एककोशीय से बहुकोशीय बनने की प्रक्रिया |
रुक गए तो
शीत निद्रा में चले
क्या पता कब नीद खुले |
नित नयी बदलती तकनीक
आह्वान देती हमें
बदलाव का |
मन को प्रफुल्लित करती वह
जीने का गुर सिखाती
हमें कदम से कदम मिलना सिखाती |
सीखते चलें
समझते चलें
कुछ नया करते चलें|
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