मंगलवार, 27 मार्च 2012

नई तकनीक


बदलते समय के साथ
हम बदले
तो छूट जायेंगे अपनों से |
जो छूटा उसे क्या याद करे
क्यूँ याद करे
जब साथ निभा पाए वे |
यादों पर दुनियां चलती
तो कबका
यादों का शहर बस गया होता |
बदलाव ही यात्रा  है
प्रकृति से सीखें हम
एककोशीय  से बहुकोशीय  बनने की प्रक्रिया |
रुक गए तो 
शीत निद्रा में चले
क्या पता कब नीद खुले |
नित नयी बदलती  तकनीक
आह्वान देती हमें
बदलाव का |
मन को प्रफुल्लित करती वह
जीने का गुर सिखाती
हमें कदम से कदम मिलना सिखाती |
सीखते चलें
समझते चलें
कुछ नया करते चलें|

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