१९८४
एक ही दीपशिखा
देती है प्रकाश
हरती है निराशा का अंधकार
जलाती भी है किसी का घर |
एक ही मशाल
देती है आत्मविश्वास
या फिर जलाती है स्वाभिमान |
एक लकड़ी कमजोर नहीं
जब उछल कर
पड़ती है सिर पर
तब आते हैं दिन में तारे नजर |
एक के पीछे चलती है
दुनियां
दस के पीछे
कोई नहीं |
एक
बेजोड़ है
इस सरीखा
कोई नहीं |
न कर अनुताप
अकेलेपन का तू
रख तो पहला कदम
सारी दुनियां ही है तुम्हारी |
एक ही दीपशिखा
देती है प्रकाश
हरती है निराशा का अंधकार
जलाती भी है किसी का घर |
एक ही मशाल
देती है आत्मविश्वास
या फिर जलाती है स्वाभिमान |
एक लकड़ी कमजोर नहीं
जब उछल कर
पड़ती है सिर पर
तब आते हैं दिन में तारे नजर |
एक के पीछे चलती है
दुनियां
दस के पीछे
कोई नहीं |
एक
बेजोड़ है
इस सरीखा
कोई नहीं |
न कर अनुताप
अकेलेपन का तू
रख तो पहला कदम
सारी दुनियां ही है तुम्हारी |
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