भविष्य की ओर
नहीं उठते पांव जब
वर्तमान बन जाता है अतीत तब |
स्वयं मन बन भविष्य
देखने लगता है वर्तमान को
और जीवन बन जाता है तालाब |
बस यों ही
चलती रहती हैं
घड़ी की सुईयां |
मन का झूठा आश्वासन
जीवन को धीरे धीरे लपेटने लगता है
धागे सा |
हे मानव !
क्यूँ नहीं हो जाता
मन पर सवार
और लेता थाम उसकी लगाम ?
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