०६.०९.९७
शून्य तुम
कितने मोहक और शक्तिशाली हो !
बरसात के साथ आते हो
तो फसलें नष्ट कर देते हो |
अकेले जब चमकते हो दिन में
तब नवजीवन देते हो सजीवों को |
रात में जब झांकते हो खिडकी से
तब नहला जाते हो मानव को शीतलता से |
किसी संख्या की बायीं ओर खड़ा हो
उसका महत्त्व बढ़ा देते हो |
यह सौर -मंडल आज
जा रहा तुम्हारे गह्वर में |
यही सत्य है चिरंतन
तेरे आगे नतमस्तक है यह मस्तक |
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