१९९०.
नव युग के निर्माता !
झंकृत किया है तुमने
स्थिर तारों को |
फूँका है तुमने
नव चेतना
मौन शंख में |
उद्वेलित मन
कुछ करने को आतुर
तू न सोंच |
निविड़ रात्रि में
मन दीप जला
निकल मेरे मन |
क्या भय
क्या भय
अकेलेपन का
है साथ तेरे सत्य |
तेरा सत्साहस
ले जायेगा खींच
अनेक कदमों को तुम्हारे पीछे |
हजारों कदमों की
एक सी आहट
देगी तुझे उत्साह सतत चलने का |
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