३०.०४.०१.
मातृत्व
पुराने पन्ने पलटते पलटते
याद आता है
तुम दोनों का बचपन |
इतिहास के वक्षस्थल में
जाता है दीख
संग्रामस्थल का विशाल मैदान |
दिखता है
प्रतारणा से
डरे सहमे दो चहरे |
कुछ पल बाद दीख जाता है
मेरी हथेलियों के नीचे
निश्चिन्त सोता बालपन |
और
मेरी उंगलियां थाम
चलते दो प्रफुल्ल बाल चहरे |
ये दृश्य
बोलने लगते हैं
मातृत्व का अस्तित्व |
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