रविवार, 18 मार्च 2012

युद्ध छावनी से एक पत्र

१९९० .

क्या लिखूं मित्र
लेखनी लिखती ही नही
केवल कागज भिगोती है |
ऐसे ही क्या कम भींगी हू |
मैं कुछ न लिखूंगी
कुछ न कहूँगी
कुछ न सुनूंगी
भय है कहीं छलक न जाये
सब्र का प्याला
और ज्वालामुखी में तुम भस्म हो जाओ |
रहने दो मुझे मौन
मैंने विषपान किया है
बोलूंगी तभी मैं
जब शिव सा धारण कर लुंगी |
मित्र जंग छेड़ा है तो
जीत कर ही आऊंगी |
तलवार का लहू देता है
मुझे आत्मतृप्ति
एक हिंसा
एक नशा |
मतवाली हूँ मैं
मेरी राह में न आना
रक्त तिलक लगाया है मैंने
अपने ही लहू का |
मेरे नाम का हार
हर दिन गूंथना
क्या पता मैं कब लौट आऊँ जीत कर
और तुम्हारे पास पहनाने को हार ही न हो |
मित्र मैं न आई तो
मेरी रत्न जड़ित तलवार
तो आएगी ही तुम्हारे पास |
तुम हार मेरे चित्र पर चढ़ा देना
और तलवार अपने बैठक -घर में सजा देना |
हो न हो
किसी आगंतुक को
उस तलवार की आवश्यकता पड़ जाय |
जंग छेड़ा है तो
जीत कर ही लौटूंगी
ऐसा दृढ़ विश्वास है |
मुझे मौन रहने दो
अन्यथा मेरी आवाज
हर घर से निकालेगी
एक इंकलाबी
और फिर प्रलय हो जाएगा |
मेरी लेखनी खून में डूब जायेगी |
मंगल कमाना करो मित्र
द्ग्विजय का सेहरा बांध कर लौटूं मैं |


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