शनिवार, 31 मार्च 2012

ये लड़किया


हर वर्ष नवरात्रि में अष्टमी के दिन
कमजोर वर्ग की लड़कियों की खुलती है किस्मत
कितनो के घर भोजन करें वे
पेट तो एक ही है
पर मिले उपहार ला देता है चमक
उनकी आँखों में |
यही वे लड़कियां   हैं
जो चमकाती हैं आपका घर
इस्त्री करती हैं आपके कपड़े
बेचती हैं आपको सब्जी
खिलाती हैं आपको गरम रोटियां
और भेजती हैं अपने भाई को विद्यालय |
ये आपको सकूं देनेवाली
लड़कियां होतीं तो क्या होता क्यूं कि
स्वस्थ लड़कियां चमका देती हैं आँखों को
ये हमारे घर अच्छा काम करेगी
काम मिलने पर चली जाती हैं
दूसरे राज्यों में माता पिता की गरीबी दूर करने |
ये पुरुषों की तरह गांव में एक
शहर में एक नहीं रखतीं
मौन बस आपके घर को ही अपना घर मान
लुटाती  हैं प्यार
बूढ़ी हो जाती हैं
मात्र प्यार भरे संबोधन मौसी का पाते पाते |
यह ऐसा मजबूरी में बना सम्बन्ध
बसाता है बहुतों का घर
क्या होता अगर पैदा होती ये लड़कियां
माता पिता की प्यारी ये जानें
हमारे पास नहीं है इस समस्या का हल
' जस की तस धर दीनी चदरिया ' बस |

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

एक जीवन शैली


क्रोध न कभी कीजिये
खुद का होगा नाश
दूसरों का
शिलाविन्यास |
आसरा कभी कीजिये
रुखी सूखी खा कर
ठंडा पानी पीजिए
पैर लंबा कीजिये |
परिश्रम से डर गए
यूँ समझिए
आप गुलाम बन गए
जीते जी मर गए |
जोश को धनी की शक्ति मानिए
सहनशीलता को गरीब की
गरीब शब्द गाली नहीं
शान है आपकी |
ऊँचे ख्वाब देखिये
पहनिए सादी पोशाक
एक समय भोजन कर
लंबी तानिये |
जब जी घबराए
चिंता की कोई बात नहीं
फेस बुक खोलिए
हम है आपके साथ |

एक करवट


हजारों युवतियां
अच्छे ढंग से कम तनख्वाह में
अंग्रेजी विद्यालयों में
सुरक्षित रखी हैं अपना वजूद और शैक्षणिक स्तर |
ये भरे पूरे समाज में सम्माननीय घर की युवतियां
दे रही हैं लड़कियों में एक सोंच
धन जेवर से बढ़ कर है
समाज में अपनी एक  पहचान  |
खुली हवा में
साँस लेने के लिए
साथ में सुखद परिवार बनाने के लिए
पिस रही हैं ये |
फल दीख भी रहा है
बोर्ड परीक्षा के बाद स्कूटी में
गीत गाती मोहल्ले का चक्कर काटती लड़कियां
उनकी बेतुकल्फी देख लड़के बदल लेते हैं रास्ते |
करवट बदल रहा है समाज
यह एक मौन जन आन्दोलन है
उस वर्ग का
जिसने समझा था अपनों के अधीन रहना ही जीवन है |
आधी आबादी तो
समझ ही नहीं पाती अपने अधिकारों को
यह युवा सोंच ही
परिवर्तन लाएगा |
सबसे ज्यादा स्वतन्त्र हैं
कमजोर वर्ग की आबादी
सब काम करते हैं
वे अपने जीवन में व्यस्त है भरे पुरों की शतरंज से नावाकिफ |

जीवन यात्रा


जीवन एक यात्रा है
चलते चलते थकने पर मन
सुस्ताने लगता है एक वृक्ष के नीचे |
हिसाब लगाता  है वो
क्या खोया क्या पाया
और पायी चीजों को बांध फिर चल पड़ता है |
कितना मोह है उसे प्राप्य पर
खोना नहीं चाहता उसे
पूरी ताकत लगाये रखता है |
कैसा लगता होगा उसे
जब वह जान जाता होगा
अब बस खत्म |
मुंह मोड़ लेता होगा
अपनों से
अपनों से बड़ी आशा रहती है |
मन में एक प्रश्न उठता है
क्या ऐसी ही यात्रा होती है
शायद ईमानदार ,संवेदनशील प्राणी की ऐसी ही होती है |

नाटक के पात्र


कभी कभी शोर गुल में भी
घिंच जाती है सन्नाटे की परिधि |
केंद्रविंदु मन
भौंचक खड़ा रह जाता है |
छा जाता है गहन अँधेरा
कितना सकून देता है यह अँधेरा |
दिन भर के बाणों के घाव पर
रखता है मरहम |
और हम बस
यूँ ही लुढक जाते हैं |
कवि भी क्या अद्भुद प्राणी  है
जीता है कितने मुखौटे पहने |
सच ही कहा है किसीने
जीवन एक रंगमंच है और हम हैं उसके पात्र |

गुरुवार, 29 मार्च 2012

गृहणी


आइये ! जरा विचारें हम
उन गृहणियों के श्रम के मूल्य के बारे में
उसका मूल्य अनमोल है कह कर बचा नहीं जा सकता |
वे बच्चे पैदा करती हैं
पालती हैं
घर के लिए बाहर जा कर छोटे संस्थानों में कमाती भी हैं |
वे कांच की छत तले
कांच की दीवारों से घिरी
काला धन हैं जिसका सरकारी खाते में हिसाब नहीं |
कब खुलेंगे ये खाते ?
कब आएगा उनके खातों में
उनका अपना पैसा
यह एक पुराना मुद्दा है हर बार नए तरीके से नए साल में |

वो हक छीनती है


लडकी बराबरी करती है
भाई से
भाभी से नहीं |
वो हक मांगती है
पिता से
माता से नहीं |
वो अपना हक छीनती है
समाज से
मित्र से नहीं |

बुधवार, 28 मार्च 2012

ये कैसी नींव ?


बेटी की कमाई खाओगे क्या ?
अरे लगा दिया है नौकरी पर
अपने शादी का पैसा तो जुटा लेगी |
शर्म आती है
बेटी के बाप की मजबूरी पर
पुत्र और उसके पिता की बेहयाई पर |
विवाह तो स्वस्थ समाज की  नींव है
पत्नी धन से बसा घर
क्या सुख देगा |
बिना परिश्रम का मिला धन
सुविधाभोगी बनाता है
पैदा करता है वृद्धाश्रम |
बच्चे ही समाज का बीज हैं
क्या बो रहे हैं हम उनमें
हम कहाँ जा रहे हैं ?

सरकारी स्कीम


स्त्री अगर शक्तिहीन है
कैसी भी सरकारी  स्कीम क्यूँ न हो
उस स्कीम की तहत चली स्त्री
या तो बीच में ही रास्ते से हट जायेगी
या कोई और उसे आगे कर फायदा उठाएगा उसका |

छोटे छोटे सपने


मन करता है
सोऊं ही |
कितने सपने आते हैं
और टूट जाते हैं समय की आंधी में |
शायद सपनों की प्रजनन शक्ति
कुछ  ज्यादा है |
हम निष्क्रिय से
उड़ते हुए देखते हैं सपनों को |
आगे भी तो बढ़ना है
जीना है अगर तो |
पथरीला जीवन
कितना रोमांचकारी होता है |
हवा खींचती जाती है
सपनों के फूल थामे बस यूँ ही बढ़ते जाते हैं हम |

मंगलवार, 27 मार्च 2012

इस्पाती मानव


स्पात नगरी में
इस्पात बनना चाहेंगे
तो भी बन जायेंगे |
फौलादी मन है
तन भले हो
चलते चले जायेंगे ए इच्छित भविष्य की ओर |
एक निश्चित सांचे में ढले मन को 
पिघलाने की गर्मी ढूंढना कठिन है
हाँ तोड़ना है तो तोड़ दीजिए |
अरे ! छोड़ भी दीजिए
वह अपनी रोबोटिक दुनिया में
मस्त है ,व्यस्त है ,अपने में डूबा |
जाने से पहले
कुछ दे कर ही जायेगा
ले कर नहीं |
आपको लूटने को
उसीका घर मिला ..
आप कुछ काम क्यूँ नहीं करते ?
बिना श्रम के
जल्दी ही सुख पाना चाहते हैं
आप अपना गांव छोड़ इसी लिए आये हैं |
क्यूँ गांव को बदनाम करना चाहते हैं
यहाँ लोग लोग चुपचाप जीते हैं
अपने में डूबे |
यहाँ रिश्ते नहीं रहते
पति पत्नी और बच्चे रहते हैं
या फिर मात्र पति पत्नी |
खुश हैं
खुश रहने दो इन्हें
तुम भी खुश रहो |







  

नई तकनीक


बदलते समय के साथ
हम बदले
तो छूट जायेंगे अपनों से |
जो छूटा उसे क्या याद करे
क्यूँ याद करे
जब साथ निभा पाए वे |
यादों पर दुनियां चलती
तो कबका
यादों का शहर बस गया होता |
बदलाव ही यात्रा  है
प्रकृति से सीखें हम
एककोशीय  से बहुकोशीय  बनने की प्रक्रिया |
रुक गए तो 
शीत निद्रा में चले
क्या पता कब नीद खुले |
नित नयी बदलती  तकनीक
आह्वान देती हमें
बदलाव का |
मन को प्रफुल्लित करती वह
जीने का गुर सिखाती
हमें कदम से कदम मिलना सिखाती |
सीखते चलें
समझते चलें
कुछ नया करते चलें|