झूठ की नींव
पे बन थे जो रिश्ते
चुभें सदा वे
आजीवन हमें
तो
लहुलुहान करें |
खामोश घर
कितनी बातें
करे
हमसे सदा
हम ढूंढते
लम्हे
दीवारों
पे लिखे |
कर लें बन्द
द्वार तो आ ही जाती
हवा चंचल
प्रगति
की देखो तो !
झांकती
झरोखे से |
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