शनिवार, 25 अगस्त 2012

तांका - 3


झूठ की नींव
पे बन थे जो रिश्ते
चुभें सदा वे
आजीवन हमें तो
लहुलुहान करें |


खामोश घर
कितनी बातें करे
हमसे सदा
हम ढूंढते लम्हे
दीवारों पे लिखे |

कर लें  बन्द
द्वार तो ही जाती
हवा चंचल
प्रगति की देखो तो !
झांकती झरोखे से |

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