#इन्दु_बाला_सिंह
दादी कहती थी
देख मैं पानी में डुबो रोटी खाती हूँ
मैं मुँह बिदोरती थी ……
आज
अपनी दादी से ज़्यादा उमर की हूँ
रोटी को पानी में डुबोने की ज़रूरत नहीं मुझे
सूखी रोटी ही मीठी लगती है
बिस्कुट से ज़्यादा भाती है मुझे यह रोटी ।
24/10/24
My 3rd of 7 blogs, i.e. अनुभवों के पंछी, कहानियों का पेड़, ek chouthayee akash, बोलते चित्र, Beyond Clouds, Sansmaran, Indu's World.
#इन्दु_बाला_सिंह
दादी कहती थी
देख मैं पानी में डुबो रोटी खाती हूँ
मैं मुँह बिदोरती थी ……
आज
अपनी दादी से ज़्यादा उमर की हूँ
रोटी को पानी में डुबोने की ज़रूरत नहीं मुझे
सूखी रोटी ही मीठी लगती है
बिस्कुट से ज़्यादा भाती है मुझे यह रोटी ।
24/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
जंगलों को शहर निगल रहे हैं
और
शहर को महानगर
इंसान को सुविधा दे रही है स्मार्ट सिटी
पर्यावरण तो राजनीतिक मुद्दे हैं
हम ए० सी० रूम , कार , ऑफिस , मॉल में निश्चिंत है
हमारी संवाद हीनता बढ़ रही है
गाँव ख़ाली हो रहे हैं
रिश्तों की गर्माहट तलाशता मन भटक रहा है
संयुक्त परिवार छोटा परिवार बन गया
एकल परिवार का जादू
तो
सर पर चढ़ रहा है
हम प्रगति के कर रहे हैं ।
22/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
लिंगभेद मिटाते मिटाते
बड़ी देर में
समझ आई ……
लड़की मतलब बच्चेदानी और सेविका
इन्हीं दो गुणों के सहारे निकलती है हंसते रोते
उसकी ज़िंदगी .…
बाक़ी सब राजनीति है
क़िस्मत है
पिता की समझदारी है ।
23/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
जहां भी रहूँगी
आऊँगी मैं दीया रखने
अपनी देहरी पर
तू नहीं रोक सकता मुझे
ये मेरी नींव है
इस नींव में मेरी आत्मा बसती है
सदा बारूँगी दीया मैं
न भी रही
तो
सदा बरूँगी मैं दीया बन अपनी देहरी पर
तृप्त होने पर ही जाऊँगी
मैं
अपनी देहरी से ।
21/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
पेशाबदानी दे दे बेटा
नंग धड़धड़ंग पिता ने मनुहार की थी
नहीं तो पेशाब बिस्तर पर हो जायेगा
आ कर तुम्हारा भाई ग़ुस्सा करेगा
पीठ में घाव था
शरीर असक्त था
वे उठ नहीं पा रहे थे
बेटी माँ बन गयी थी इस पल
पर
बेटा पिता नहीं बन पाया था
बेटी ने पेशबदानी पिता को पकड़ा दी
रात भर सोते नहीं थे पिता
चादर को चुन्नट करते रहते थे
बेटी दुःखी रहती थी
अपने आजीवन सहारा रहे पिता के अंतिम महीनों की असहायता देख कर
वह तो स्वयं पिता पर मानसिक तौर पर निर्भर थी
राशन मँगवाना से ले कर
बिजली बिल भरवाना
होल्डिंग टैक्स देना
बिस्तर पर लेटे पिता
अपनी आँखों के सामने करवाते थे पिता
उस दिन बेटे को चिंघाड़ कर आवाज़ लगाये पिता अस्पताल के बेड पर
बेटा पास न था
पास में था केवल अटेंडेंट
एक हिचकी आई
खून का थक्का निकला
और प्राण भी निकला ।
18/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
आठ साल की उम्र में
छः महीने की बहन गुजर गयी डिप्थीरिया से
पति गुजर गये
हार्ट अटैक से
पिता गुजर गये
बीमारी से
माँ गुजर गयी
बुढ़ापे और अकेलेपन के दुःख से
ससुर गुजरे कैंसर से
सास गुजरी
हार्ट अटैक से
कभी न रोयी वह
मुझे ख़ुद पर आश्चर्य होता है
बस
हर मौत पर
एक ख़ालीपन और भय सिमट जाता था उसमें
लगता था मूरत बन गयी है वह
आज सोंचती हूँ
ऐसी क्यों थी वह ?
पर रोयी थी वह
एक बार
जिस दिन उसकी बेटी
उसे बिना बताये घर छोड़ कर चली गयी थी
अपने पुरुष मित्र के साथ ।
18/10/24
#part_2_poem
#इन्दु_बाला_सिंह
मातृत्व के नाम पे
सतीत्व के नाम पे
बलात्कार के नाम पे
डरना मना है
जिस दिन कर्म को धर्म समझेगी लड़की
उस दिन वह मानसिक रूप से
आज़ाद हो जायेगी
स्वस्थ हो जायेगी
और
समाज स्वस्थ होगा ।
17/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
मेरे पिता गये नहीं
बस गये हैं मुझमें
हर थोड़ी देर बाद मैं बातें करती हूँ उनसे
पूछती हूँ उनसे ढेर सारे प्रश्न
पर वे चुप रहते हैं
कभी कभी वे मेरे सपने में आते हैं
मेरी समस्याओं का समाधान करते हैं
लोग यूँ ही कहते हैं -
इसका पिता गुजर गया है
अब नहीं लौटेगा ।
14/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
ग़ज़ब की माँ थी वह
उसके अंदर लाड़ , स्नेह नहीं था
वह
ख़ूँख़ार थी
कठोर थी
अपने बच्चों के लिये वह सुरक्षा घेरा थी
उसने
कभी नहीं निकलने दिया उस घेरा के बाहर
अपनी औलादों को
उन्हें बाहर की कहानियाँ भी न सुनाई
वह नहीं चाहती थी
बाहर की वीभत्स सच्चाई से परिचित हों इसके बच्चे
बचपन की मासूमियत खोने से सपने टूट जाते हैं
बच्चे बड़े हुये
और नाखुश हुये अपनी माँ से
सब की माँ
करुणा की सागर थी
स्नेहिल थी
अजीब औरत थी उनकी माँ ।
13/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
नानी मुश्किल से चल फिर पाती थी
नौकरानी ख़ाना पका के खिला कर चली जाती थी
नर्स का काम था नहलाना धुलाना नानी को
बाक़ी समय बग़ल के बिस्तर पर बैठ कर अपने कॉलेज की पढ़ाई करती थी वह
नर्स की उपस्थिति नानी का अकेलापन दूर करती थी
किसी कारण वश नर्स कमरे से बाहर चली जाती
तो
नानी अपने गाँव का शादी का गीत गाने लगती थी
गीत सुन कर मेरे मन में प्रश्न उठता था
आख़िर नानी क्या सोंचती होगी ?
कभी कभी तो वो सोहर भी गाती थी
मैं सोंचती -
बेटा सागर पार है
और
सोहर गाते समय नानी के मन में क्या भाव आते होंगे ?
लोक गीत हमें अपने काल में खींच ले जाता है
नानी का गाना मुझे मौन रुदन सा महसूस होता था
जीवन संध्या भी अजीब होती है ।
10/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
जीवन की भागदौड़ में
बेटियाँ
ठहराव होती हैं
बरगद की छाँव होती हैं
उनकी आँखों में हमें नया समय दिखता है
आशा दिखती है
कल्पना की उड़ान दिखती है ……
पारियों की परिकथाओं सी होती हैं बेटियाँ
बहन सी श्रद्धा और माँ सी असीस होती हैं बेटियाँ
बेटी का अपमान
ख़ुद का आत्महन्त है
बिन बेटी घर सूना ।
11/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
बचपन में पिता खोई बच्ची ने माँ का संघर्ष देखा
माँ की बीमारी में उसका अकेलापन देखा
सबकी माँ के दुःख के पल में पिता खड़े रहते हैं सहारा बन कर
पर
इस छोटी बच्ची को ख़ुद अपनी माँ का सहारा बनना पड़ा
माँ और बेटी दोनों एक दूसरे के सहायक थे
लड़की को कसरत करते समय राजनीतिक मित्रों का सहारा लेना पड़ा
पिता तो पिता होता है
पिता तलाशती है लड़की विभिन्न पुरुषों में
कभी कभी वह आजीवन पिता तलाशती रह जाती है ।
08/10/24
#part_2_poem
#इन्दु_बाला_सिंह
कब तक और कितनी औरतें मौन रहेंगी
परिवार की सुख सुविधा के लिये मिटती जातीं हैं
एक पीढ़ी के पीछे दूसरी पीढ़ी संस्कार के नाम पर
रिश्तों की तंग गलियों में घुटती हैं
कभी सुरक्षा के नाम पर मौन की जातीं हैं
तो कभी परिवार की इज्जत के नाम पे
पिता हक़ दो बेटी का
बेटी को शक्ति दो
उसे प्रश्न पूछने लायक़ बनाओ
जिससे वह आजीवन
सवाल करना न छोड़े
ओ औरत !
तुम्हारे सवाल तुम्हारी आजादी की नींव हैं
तुम अपने सामनेवाले को आईना दिखा सकती हो
देश आज़ाद सवालों से हुआ
अपने हक़ के लिये सभी प्रश्न उठाये और लड़े
लड़ो लड़कियों लड़ो
ओरतो लड़ो
अपनी अस्मिता के लिये नागरिक अधिकार के लिये लड़ो ।
09/10/24
#इन्दु_बाला_सिंह
बेकारी बढ़ गयी थी
हर वर्ग में आक्रोश था
नेताओं को कुछ करना था
उन्हें अपने पद की चिंता थी
मुनादी हुयी -
सत्यवादी अल्पसंख्यक हो गये हैं
उनके लिये दस प्रतिशत कोटे की व्यवस्था की गयी है ।
सभी अपने अपने को सत्यवादी कहने लगे
सत्यवादिता के सर्टिफिकेट पर कलक्टर मुहर लगाने का जिम्मा सौंपा गया
कलक्टर सरकारी अधिकारी था
वैसे जज को भी पावर दिया गया था सर्टिफिकेट पर मुहर लगाने का
लंबी लाइन लगने लगी
सत्यवादिता के सर्टिफिकेट बनवाने के लिये
नौकरी का आरक्षण प्रलोभनकारी था
धर्म , जाति और महिलाओं का आरक्षण ख़त्म हो चुका था
सरकारी नौकरी घट गयी थी
ऐसे में सत्यवादिता का आरक्षण बड़े काम की चीज थी
आम जनता को शांत करने के लिये
अब लोग नारे लगाना भूल गये ।
#इन्दु_बाला_सिंह
वृद्धाश्रम में हैं औरतें
वे अकेली कैसे रहें
मर्द होता
तो रह ही लेता अकेला
अपने घर में भी डर है औरतों को
बेटी के जन्मते ही
उसके भविष्य की चिंता करने लगते हैं पिता
बेटी से घर है
पर
बेटी सुरक्षित नहीं
कितना भी पढ़ लिख ले बेटी
सुरक्षा सदा एक मुद्दा रहा है पिता के लिये
ब्याह कर बेटी का
उसे सुरक्षित घर में पहुँचाते है वे
आगे भवितव्यता पर निर्भर है
देह व्यापार में तृप्त करतीं हैं बहुतों को औरतें
अरे!
औरतें सरकारी पदों पर हैं
कॉर्पोरेट सेक्टर में हैं
स्पेस में जा रही हैं
पर्वतारोहण कर रही हैं ….…
कितनी प्रतिष्ठित पदों पर हैं वे
पूजी जातीं है वे नवरात्रि में
फिर
कैसे लोग कहते हैं -
दलितों में महा दलित हैं महिलायें
घरों की खिड़कियों से अंदर झांकने का दम भला कैसे हो ।
#इन्दु_बाला_सिंह
सतत भाग्य से लड़ते रहे
समय कटता रहा
अस्तित्व की लड़ाई जारी रही
गुमनाम ही रह गये
बुद्धिहीन कहलाते रहे
सकून की तलाश में भटकते रहे
घर ही न था
तो चिराग़ भी न बन सके
चौहत्तर के हो गये
बस पेंशनहीन जीवन जीते रहे
भटकते रहे हम ।
#इन्दु_बाला_सिंह
ऊँची जाति
ऊँची डिग्री
एकाएक धन का आगमन
जन्माता है अहंकार
इंसान में
आसपास के लोग उसे कीड़े मकोड़े लगने लगते हैं
एक निरंकुशता सी जन्म लेने लगती है
उस के मन में
धीरे धीरे
उसका पतन शुरू होने लगता है .…
कभी कभी कुलांगार भी जन्म ले लेता है
किसी सौम्य उच्च वर्ग परिवार में ।