शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

पुत्री की माँ

पिता और पति की धूरी पर घूमती
स्त्री की जिन्दगी
प्रतिफल पाती औरत
पिता व पति के कर्मों का
जग से हारी औरत
गले लगा अग्नि को पूजनीय बन जाती
शाश्वत सत्य है ये कथा तेरी
ओ पुत्रवती ! नमन करूं मै तुझे
हो विकल मैं चली ढूंढने

अब  पुत्री की माँ |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें