रविवार, 18 अगस्त 2013

मन ! तलवार न धर

कूद पड़ना तलवार ले
सामने की जंग में
ये कैसी फितरत है तेरी
मन तू क्यों मानता नहीं
सामनेवाले को सुधार करने से भला क्यों चूकता नहीं
बुद्धि आज है परेशान खडी
ये कैसी विडम्बना है
एक कोशीय से बहुकोशीय हो गये
तू परिवर्तित होता नहीं
कब बदलेगा तू    
तेरी शाश्वत साथिन बुद्धि आज तुझसे प्रश्न करे |

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