- इंदु बाला सिंह
सोंच को नदी बना
ओ रे मानव !
अनुभूति राह की ऊबड़ खाबड़ भूमि , बदलते मौसम से गुजरती हुई
जब जब हर रात लौटेगी तेरे पास
बना जाएगी
वह तेरी चेतन भूमि को उर्वरा .......
सावधानी से रखा सिक्का ही आये ........समय पे काम
रिश्ते न जानें कब गुम जायें
जीवन के किसी मोड़ पे ।
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