सोमवार, 31 अगस्त 2015

ठंड है जरूरी


01 September 2015
12:09


-इंदु बाला सिंह

मन !
ठंड रख .........
वर्ना हो जायेगा तू पागल
अपनी
इस सुख दुःख की गर्मी से
एक दिन |

बुधवार, 26 अगस्त 2015

कराह न सका


27 August 2015
07:06



-इंदु बाला सिंह

गृहस्थ के एक वस्त्र ने
मारी ऐसी मार
कि
कराह सका संसार |

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

नन्हा पौधा


21 August 2015
12:08


-इंदु बाला सिंह

वृद्धाश्रम में है
हमारा जीवित इतिहास
और
अनाथाश्रम में भविष्य ......
बरगद तले उपजा एक नन्हा पौधा
है सोंच रहा ...
कब बनेगा वह विशालकाय |

चिन्तन ...मनन


21 August 2015
08:07

-इंदु बाला सिंह

आये हैं तो जायेंगे 
पर
हम गुलाम न बनेंगे .......
मुफ्त की चाय ....मुफ्त का भोजन ....गलत बात .... गलत बात .........
पर दोषारोपण .... गलत बात .....गलत बात ........
पठन ...चिन्तन ....मनन ........अच्छी बात ........अच्छी बात |

तुम ही तो इश्वर हो


20 August 2015
17:44


-इंदु बाला सिंह


ओ माँ !
तुम ही तो इश्वर हो .........
मुझे जन्माने का कष्ट
मैंने माँ बन कर जाना
और
तुम्हे लेबर रूम में तड़पते देख
मेरा पिता ने भी जरूर महसूसा था होगा ......
तुम ही तो शक्ति हो माँ |

गजब की नींव


20 August 2015
16:58


-इंदु बाला सिंह


शिकायत कर कर के
जब
चुप हो जाता है बच्चा
तब
वह शांत नहीं रहता है .......
वह जलने लगता है
प्रतिशोध की ज्वाला में ...........
क्यों नजरअंदाज करते हैं 
हम
अपने बच्चे की शिकायतें .......
गजब की नींव बना रहे हैं हम
अपने घर की |

रविवार, 16 अगस्त 2015

निम्न वर्ग का उत्थान


16 August 2015
22:58

-इंदु बाला सिंह


मंगनी का टी शर्ट और जींस पहन के
सड़क पे चहकती है ........दौड़ती है
स्कूटी नहीं है तो ........क्या गम है
मस्त है ...खुश है
कामवाली की अठरह वर्षीय बेटी ........
वह बन गयी है
मालिक की बिटिया सरीखी 
यह कैसी प्रगतिशीलता है !
कौन समझावे
उस कामवाली को ........
जो समझावे उसे
वही दुश्मन कहलावे ........
यह अजीब सा उत्थान हो रहा
निम्न वर्ग का |

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

मैं अपना भाग्य विधाता हूं


15 August 2015
00:51

-इंदु बाला सिंह

आजादी का जश्न मनाते वक्त
याद आये
मुझे
मेरे जन्मदाता
जिनके
त्यागपूर्ण जीवन के बल पे
सदा जलती रही
कुछ कर गुजरने की लौ
मेरे मन में .......
आज
इस सम्मानजनक समाज में
क्यूं न याद करूं मैं
अपना ...........आर्थिक अभाव ........
बदली मैंने अपनी किस्मत
अपने छोटे छोटे हाथों से ......
आज खोली जो मुट्ठी मैंने अपने अंधेरे कमरे में
तो
रोशन हो गया .......
मेरा कमरा .........मेरा जहाँ ........
मैं अपना भाग्य विधाता हूं |

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

काश ! मिलतीं पुस्तकें


13 August 2015
16:24


-इंदु बाला सिंह


घरों से
शनिवार को मिलता है
चावल या पैसे
किसी किसी त्यौहार में तो पुराने कपड़ों के गट्ठर
दिखते हैं सड़क पर .... अभावग्रस्त ........ परिवार से प्रताड़ित अपने
काश !
एक दिन ऐसा होता
जब
दान में मिलतीं
घरों से
पुस्तकें .....कहानियों की
और
दिखते सड़क पे ..........सपनों के भूखे |

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

मन नहीं मरता


11 August 2015
13:40


-इंदु बाला सिंह


मन
इतिहास है
वह नहीं मरता ........
वह जीता है ......तृप्त होता है .........
अपनों की आकांक्षाओं में ......
मन 
कहानियां बन
मुखरित होता हैं
पुस्त दर पुस्त
किसी
खाली दुपहरिया
या
किसी शाम की बतकही में ...
आज भी गाते हैं
हम
कहानियां अपने पूर्वजों की |

सोमवार, 10 अगस्त 2015

हरी हरी चूड़ियां


11 August 2015
12:03

-इंदु बाला सिंह


हरी हरी चूड़ियां पहन के
सुबह सुबह मन्दिर जा रहीं हैं पड़ोस की औरतें
दादी के मुंह से अनायास निकल पड़ा .........
पिता मौन रहे |
कलप गया पोता ........
काश !
पिता के मुंह से निकलता .....
तुम भी पहनो
हरी हरी चूड़ियां
किसीने 
तुम्हें रोका है क्या  |

रविवार, 9 अगस्त 2015

मन के टांके


10 August 2015
07:03


-इंदु बाला सिंह

मिटते नहीं
अपनों से मिले घाव के दाग
लाख जतन कर चमका ले तू चमड़ी ........
सिले
मन के टांके
खुल ही जाते हैं
समय के अंधियारे में ........
ब्लैक होल के करीब पहुंचते ही
कभीकभार पारदर्शी आंखों में दिख जाता है
अर्जुन को
समूचा ब्रम्हांड |

उजाड़ बिल्डिंग


09 August 2015
10:26


-इंदु बाला सिंह


ताला मार दिया उसने
अपने कमरे में ........
फिर ताला मार दिया उसने
अपनी बिल्डिंग के मुख्य द्वार में ..........
अपनी बिल्डिंग के कम्पाउंड के गेट में भी उसने ताला मार दिया ........
अब
सब कुछ उसका अपना था
अनचाहे व्यक्ति का प्रवेश अब असंभव था बिल्डिंग में ........
बाहर जाते वक्त
और
भीतर आने पर ऐसे ही ताला लग जाता था बिल्डिंग में
पर
फिर भी प्रवेश कर गयी मृत्यु उस बिल्डिंग में एक दिन ..........
ले गयी उसे ........
ताला खुल गया था
अब बिल्डिंग का
उसके रिश्तेदारों के बच्चे चहकने लगे थे
उस उजाड़ बिल्डिंग के कम्पाऊंड में |

शनिवार, 8 अगस्त 2015

अभावग्रस्त प्रतिभावान


09 August 2015
06:13

-इंदु बाला सिंह

अभावग्रस्त , प्रतिभावान , समझदार बच्चे
सरकारी योजनाओं का फायदा उठा ले जाते हैं
वे
अपने शहर के युनिवसिटी से किसी भी विषय में
डाक्टरेट की डिग्री ले आते हैं
और
किसी प्राइवेट स्कूल में
दस बीस हजार की नौकरी कर
घर बसा लेते हैं
जी लेते हैं स्वाभिमानपूर्वक अपनी जिन्दगी |

इतिहास जरूरी है



08 August 2015
21:51

-इंदु बाला सिंह

वन
धरती की शान है
पखेरुओं का आश्रय स्थल है ......
वृक्ष न कांटे हम
ये
आदिवासियों का इतिहास  है
हमारे पूर्वजों का इतिहास है
मौसम रूठ जायेगा
आदिम जातियां लुप्त हो जायेंगी .................
बंजर मन भटकेगा कंक्रीट के स्मार्ट शहर  में
और
एक दिन
गुम जायेंगी
हमारी सांसे भी |

सत्यवादी न दिखी


08 August 2015
12:35

-इंदु बाला सिंह


परेशान थे
कुनबे के लोग
सत्यवादी से
एक रात मन्त्रणा हुयी .......
इसे देवी घोषित कर देंगे
नहीं नहीं इसे डाइन घोषित कर देंगे
और
दुसरे दिन सत्यवादी अपने घर में न दिखी किसी को |

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

बिल्ली पालने की परमिशन


07 August 2015
15:30

-इंदु बाला सिंह


चूहा आया ! घर में
गृहणी टाईट
पूरे घर के सदस्य टाईट
घर में सब कुछ अनुशाषित
चलने लगा घर में स्वच्छता अभियान ....
कुछ खाने का सामन न गिराना जमीन पर ......
अरे ! स्टडी टेबल पर मत खाओ
पलंग पर लेट के बिस्कुट मत खाओ
हर कमरे में सुबह शाम फिनाईल पानी से पोचा होने लगा
कोई सामन अस्त ब्यस्त मत रखो कहीं भी चूहा छुप के बैठ जायेगा
रात में सब मछरदानी लगा के सोने लगे
क्या पता रात में किसी की  उंगली ही कुतर ले चूहा
और
मुन्ना तो हो गया खुश
क्यों कि उसकी महीनों पुरानी मुराद पूरी हो गयी
उसे
बिल्ली पालने की परमिशन मिल गयी |

बुधवार, 5 अगस्त 2015

घर का भेदी


06 August 2015
07:00

-इंदु बाला सिंह

घर का भेदी बनने की ताकत
पूछिये .....जरा भेदिये से
समय याद रखता है उसे .................
और
पीढियां सुख भोगती हैं |

ट्रेन में स्वच्छता अभियान


05 August 2015
13:23
-इंदु बाला सिंह


ट्रेन ने
छोड़ा प्लेटफार्म......
छुटे
अपने
और मित्रगण
थोड़ी ही देर में
आ गये .....
बिखरे बालवाले
गदां कपड़ा पहने दो नाबलिग़ लड़के
बुहारने लगे
वे दोनों
बर्थ की जमीन पर गिरे बिस्कुट , टाफी के रैपर .......मूंगफली के छिलके
फिर
हर यात्री के सामने फ़ैलाने लगे अपना हाथ
किसी ने एक रूपये का सिक्का दिया
तो किसी दयालु ने दिया ...दो रूपये का सिक्का
मैंने मुंह फेर लिया ....
यह कैसा स्वच्छता अभियान चल रहा है
ट्रेनें साफ़ की जा रही हैं
कहाँ है
इन बच्चों का स्कल ......मध्यान्ह भोजन .......
नशा करते होंगे
चोरी भी करते होंगे ......ये बच्चे
दोषी कौन ?
रेलकर्मचारी या यात्रीगण |




मंगलवार, 4 अगस्त 2015

मूसलाधार बरसात और मुन्ना


05 August 2015
07:13


-इंदु बाला सिंह

वाह ! वाह !
मजा आया
वो देखो
नदी आ गयी सड़क पे
अब तो है छुट्टी स्कूल की
टीचर क्या हमें स्कूल ले जाने के लिये हेलीकाप्टर भेजेगी !
आज तो मस्ती है
कापियां फाड़ कर नाव बनेगी
हमारी सड़कों पर हमारी नावें दौड़ेगी ........
अहा !
फिर बाल खेलेंगे हम
अपने बरामदे में
वैसे
कभी कभी लाँन से बाल उठाने में भींग भी जायेंगे हम
अब
अरे मम्मी !......गुस्सा मत हो .....यार ! जान के तो नहीं भीगे थे हम
थैंक यु !....शंकर भगवान |

हर बेटी की अलग अलग कहानी


04 August 2015
22:44


-इंदु बाला सिंह

माँ ने चाहा .......
बिटिया लिखना पढ़ना सीख ले
कम से कम चिट्ठी पत्री लिख लेगी
पिता ने चाहा ......
बिटिया पढ़ ले मुसीबत में काम आयेगा
बेटी ने सोंचा ........
पढाई क्या मुसीबत में काम आने के लिये होती है ?
पढ़ाई
तो
शौक होती है
जिज्ञासा होती है
कमाई का साधन होती है
नौकरी करने नहीं मिलेगा ससुराल में तो मैं क्यों पढूं ?
क्या किसी अनागत मुसीबत का पहाड़ पार करने के लिये पढूं ?
क्यों डिग्री बटोरूं ...........
और
आगे की जिंदगानी
होती है हर बेटी की अलग अलग कहानी
जिसने भोगी
उसने जानी |



सोमवार, 3 अगस्त 2015

पढ़ना नहीं चाहती हैं बेटियां


04 August 2015
07:09
-इंदु बाला सिंह


घर में
बिन बताये
भाग जाती हैं बेटियां ...................
पर
घर में बिन बताये
कॉलेज की डिग्री के लिये
परीक्षा-फॉर्म नहीं भर्ती बेटियां .............
पढ़ना नहीं चाहती बेटियां ..............
शायद
समझदार हैं बेटियां .......
डिग्री की कीमत भलीभांति समझने लगी हैं गरीब बेटियां |

रविवार, 2 अगस्त 2015

लक्ष्य पताका


03 August 2015
11:34


-इंदु बाला सिंह

तेरी जीत का बीज मैं ........
तेरी हार का बीज भी मैं .............
ओ मेरे पुत्र  !
जो न जीत को ले
अपने दिल पे
और न ही अपनी हार को
वही इंसान
सदा फहराये
अपनी लक्ष्य पताका  |