सोमवार, 28 जनवरी 2019

आग ठंडी जरूर होगी ।

- इंदु बाला सिंह

गजब की थी लगन

और था जुनून

अंधी दौड़ थी उसकी

दर्शक मौन थे

पीठ पीछे खुसुर पुसुर था

कोई बुरा न कहलाना चाहता था

आग ले के पैदा नहीं हुई थी वह

समय ने लगा दी थी आग उसके जिगर में ....


मैं इंतजार में थी उसकी आग के ठंडे होने की

ज्वालामुखी ठंडा होता है तो उससे निकली धातू बड़े काम आती है

सुप्त ज्वालामुखी के पास घर भी बसता है ।




कामवाली के बिना जीवन मुश्किल है ।

-इंदु बाला सिंह

बेटी न चाहूं मैं

फेंक दिया था मैंने अपनी नवजात बेटियों को कम्बल में लपेट के

मुझे बेटा चाहिये था

जब पैदा हुआ रख लिया उसे ....

मैं तो गरीब हूं

अमीर रहती तो टेस्ट करा के अपनी बेटी पेट में ही मार देती ...

कौन बेटी को पालेगा , उसे सुरक्षा देगा

बहु तो मिल ही जायेगी मुझे

हम कमाने खानेवाले लोग हैं ....

अपनी कामवाली की बातें सुन मैं सोंच रही थी ..

यह जब बीमार पड़ेगी तो क्या अपना बेटा मेरे घर काम पे भेजेगी ?

क्या इसका बेटा मेरे कपड़े धोएगा ?

मेरे अंदर न तो डिश वाशर खरीदने की सामर्थ्य है और न ही कपड़े धोने की मशीन ।

बेटी जरूरत है ।

-इंदु बाला सिंह

आओ ! सिखायें बेटियों को हम ...

बेटी का फर्ज

बेटी की जिम्मेवारी है .....

उसके जन्मदाता , भाई , बहन

उसका पति और उसके बच्चे

बेटी को स्वस्थ और आत्मनिर्भर बनना है

क्या पता कोई  उसके सपने को अपना सपना मान सतत उसकी नींव बन खड़ा हो

याद रखना है बेटी को उस निकटस्थ मित्र को

और दुश्मनी की चाभी उसे किसी गहरे जल में फेंक देना है

बेटी  शक्ति है ..
शान है
करुणा की धारा है .

बेटी को कमजोरी और निर्भरता शब्द निकाल फेंकना है अपनी डिक्शनरी से ...

बेटी जरूरत है

क्योंकि

बहन के बिना भाई अकेला है ।


रविवार, 27 जनवरी 2019

मन भालू बन रहा है ।

- इंदु बाला सिंह

मैं कौन हूं

गाहे बगाहे प्रश्न करता है मन ....

मन बाल शिशु सा भौंचक देखता है अगल बगल

सब व्यस्त हैं

कहीं से कोई उत्तर नहीं

धीरे धीरे डूब रहा है मन ...

आखिर मन दौड़ता क्यों नहीं .... मौसम में खिलता क्यों नहीं

मन आखिर इतना जिज्ञासु क्यों है ?

मन क्यूं नहीं खुद तलाशता अपने प्रश्न का उत्तर ?

मन जाड़े में  धूप सेंकता भालू बन रहा है ।

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

मन ही सृष्टि है

- इंदु बाला सिंह

मन में ही

न जाने कब , कैसे होता है एक विस्फोट

और

जन्मता है एक कोष

गजब है ...

यूं लगता है मन धरती का सागर है

एक कोषीय जीव  फैलाये अपनी पाँखें

बस फुदक पड़ेगा जमीन पर

और बन जायेगा थलचर ....

रोज उगता है

एक आशा का सूरज

और डूबता भी है वह हर रोज दुबारा उगने के लिये  ।



सोमवार, 14 जनवरी 2019

शरीर के लिये आत्मा जरूरी नहीं ।

- इंदु बाला सिंह

ईमानदारी की छांव में बसे आत्मा

पर

वो जल जाये ...

उड़ जाये....

बन के गैस ....

बेईमानी की धूप में...

शरीर को आत्मा न होता कोई मतलब  ।


रविवार, 13 जनवरी 2019

खोते हुये पल की तड़प

- इंदु बाला सिंह

पुरानी वस्तुयें ... मात्र वस्तुयें नहीं होती हैं

वे तो मील का पत्थर होती हैं

वे हमें उस कालखण्ड में लौटा ले जाती हैं जिस पल को  हम अपने जीवन की आपाधापी में बिसरा चुके जोते हैं

बड़ा मोह होता है पुरानी वस्तुओं से

वे जब हमसे छूटती हैं तो लगता है मानो हमारे अपने कुछ पल  खो गये

आखिर क्यों छूटते हैं हमसे हमारे पल ?

काश वे पल सदा हमारे साथ रहते ।