- इंदु बाला सिंह
मन में ही
न जाने कब , कैसे होता है एक विस्फोट
और
जन्मता है एक कोष
गजब है ...
यूं लगता है मन धरती का सागर है
एक कोषीय जीव फैलाये अपनी पाँखें
बस फुदक पड़ेगा जमीन पर
और बन जायेगा थलचर ....
रोज उगता है
एक आशा का सूरज
और डूबता भी है वह हर रोज दुबारा उगने के लिये ।
मन में ही
न जाने कब , कैसे होता है एक विस्फोट
और
जन्मता है एक कोष
गजब है ...
यूं लगता है मन धरती का सागर है
एक कोषीय जीव फैलाये अपनी पाँखें
बस फुदक पड़ेगा जमीन पर
और बन जायेगा थलचर ....
रोज उगता है
एक आशा का सूरज
और डूबता भी है वह हर रोज दुबारा उगने के लिये ।
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