पिता के मकान में
गरीबी के पल में
बच्चों समेत सीमेंट के फर्श पर सुस्ताती हूं
याद आता है
दादा का गांव का विशाल मिट्टी का मकान
मिट्टी के फर्श पर चाची के बगल लेटा निश्चिंत बचपन
हर शाम व्यस्त हो जाती हूं ड्राइंग रूम की बहस में
गुटबाजी में
पितृ सत्ता को कोसने में ।
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