रविवार, 5 अप्रैल 2026

मैं अनबुझ हुं


 

 

पिता के मकान में

 

गरीबी के पल में

 

बच्चों समेत सीमेंट के फर्श  पर सुस्ताती हूं

 

याद आता है

 

दादा का  गांव का विशाल मिट्टी का मकान

 

मिट्टी के फर्श पर चाची के बगल लेटा निश्चिंत बचपन

 

हर शाम व्यस्त हो जाती हू ड्राइंग  रूम की बहस मे

 

गुटबाजी में

 

पितृ सत्ता को कोसने मे

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