गुरुवार, 6 सितंबर 2012

हाइकू - 28


मन व बुद्धि
खेलें आँख- मिचौली
तन मुस्काए |

लिली का फूल
खिले जो घर में , करे
मन प्रफुल्ल |

मन करता
लिखूं एक कविता
तेरी आँखों पे |

चुरानेवाले !
रचना क्यों चुराया ?
दिल चुरा ले !

तांका - 6


लगे छात्रों को
वही विषय प्रिय 
जिसके गुरु 
आचरण में हों सच्चे
छड़ी न लायें साथ |

माता के बाद
आज करूँ नमन
पिताश्री तुझे
सिखाया तूने कूद
बाधाएं फलांगना |

प्रकृति गुरु !
सामंजस्य बिठाना
तुझसे सीखा
वे पशु जो न सीखे 
हुए आज विलुप्त  |

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

तांका - 5


ज्ञान लौ जली
तेरे स्पर्श से माता
नमन आज
सर्वप्रथम तुझे
तू ही मेरी गुरु है |

दमके रूप
पुत्री हिन्दी का देखो
लो बंधा विश्व !
सजाओ इसे तुम
बोलियों द्वारा आज |

: बजते ही
बारिश , बच्चे दौड़े
गुरु के घर
देख उनकी मस्ती
बादल हुआ फुर्र |

अवहेलित माँ


पुत्र मेरे !
माँ तेरी मैं
कैसे भूला तू मुझे ?
आज याद आया तेरा बचपन
विधवाश्रम में यूँ ही बैठे बैठे
निज भविष्य सुघड़ बनाने हेतु
माता का ऋण कैसे भूला तू ?
जी लेती
तेरे घर में
तो श्रीहीन हो जाता
तेरा घर क्या ?
मेरा भोजन ,चिकित्सा , परिधान
क्या इतना मंहगा था
कि मुझ पर खर्च कर पाया !
हंस ही लेती तेरे संग
ढूंढती तेरा बचपन
तेरी औलाद में
इतनी खुशी भी तू दे पाया ?
मेरे मकान में
तू रहे
मेरे लिये जगंह नहीं
ये कैसे था भरमाया मुझे उस दिन ?
खुश रह ! पुत्र मेरे
जीते जी
सुख दे न सका
तो मरने पर न आना मेरे
मैं न चाहूँ मुखाग्नि तेरे हाथों |
मरणोपरांत
मेरा तन खाएं चील कौए
क्षुधा तृप्त हों वे
यही दिया है आवेदन पत्र मैंने
आश्रम के व्यवस्थापक को |

सोमवार, 3 सितंबर 2012

हाइकू - 27


ज्ञान पिपासा
रखता जो मानव 
वही विद्यार्थी |

शिक्षक होता
है छात्र याद रख
जीवन भर | 

विद्याध्यन
सा सुख जग में
सुन ले प्राणी |

प्रेम का नशा !
करना मित्र मेरे
डूबेगा घर |

भाग न


मौन बोलता
कभी कभी इतना
कि शोर गुल से घबरा कर
हम भागते जग से
ऐसा क्यों ?
रे साथी !
जन्म मिला
मानव का
कर्म हेतु
पलायनवाद क्यों ?
रे भक्त !
ईश्वर बच्चे में बसता
कर्तव्य पथ पे आगे बढ़
जब तक है जीवन
मुस्काए जा |

चोर


जाने क्यों
बुरे लगें
मुझे
रोटी चुरानेवाले
दुखी होता मन
बस |
क्रोधित हूँ
उस बाप पर
जिसे
जन्म देते वक्त औलाद
हुई खुशी
पालते वक्त दुःख |
अभावग्रस्त की फौज
हमारी
भला कर रही
धनिकों का
जिसे मिलते नौकर
सस्ते में
एक के छोड़ते ही दूसरा |
ये विशाल फौज
घरेलु नौकर , रेजा , कुली की
बुढ़ापे में क्या करती
किसे फुर्सत सोंचने की
हमारे भवन बने
हमारे कमरे चमके
इति |
क्या स्वार्थ का कारोबार
माँ -  बाप
थोड़ा घर के काम में
हाथ बंटा दें
तो नौकर क्यों रखें
चोरी से तो बचे हम |
ये अंधी
सुख - सुविधा की दौड़
कहाँ ले जा रही
क्यों सोंचे हम
क्या हम सिरफिरे हैं
कल की कल सोंचेंगे |