बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

एक माँ


बेटा
हर माह आता है
हाथ में आये
पैसों का हिसाब मांगता है |
उसकी आवाज
अपने मृत पति के पैसों का हिसाब
देते वक्त मरी सी हो जाती है | 
बचे पैसों को ले
बेटा चला जाता है
बैंक में रख दूँगा कह |
वह
बैंक का हिसाब समझ नहीं सकतीं
अंग्रेजी समझ नहीं सकती
किसी पर विश्वास नहीं करती |
उसके लिए
पुत्री दूसरे घर की है
उसके पुत्र की हितैषी कैसे हो सकती है |
बेटे के जाते ही
वो शेरनी हो जाती है
कमजोरों को धमकाती है |
उसका
शरीर जब साथ नहीं देता
बेटी की समस्या को कर नजरअंदाज
उसे ही गुहार लगाती है |
फिर वह
कोई अपना नहीं कह 
गुहार लगाती है
हे ईश्वर उठा ले इस दुनिया से |

घर का गणित


लड़कियां
घर की शान होती हैं
पहचान होती हैं
जान होती हैं |
उनके बिना
घर रेगिस्तान होता है
शमशान होता है |
वे
घर की आत्मा होती हैं
रंगों की फुहार होती हैं
भोर की मधुर तान होती हैं |
लड़के
समाज का जवाब होते हैं
माँ का उल्लास होते हैं
पिता की निश्चिन्तिता होते हैं |
उनके बिना
पिता समाज में थके हारे होते हैं
चिंतामग्न रहते हैं
ठन्डे रहते हैं |
वे
समाज का जवाब होते हैं
खिलखिलाहट होते हैं |
आकांक्षा  होते हैं
दोनों
घर की आवश्यकता हैं
परिपूर्णता हैं
मुग्धता हैं |
समाज
घर से है
उससे क्या मांगें
क्यूँ मागें |
घर
का गणित
हम खुद ही
क्यूँ न हल करें |


  

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

उसके कितने रूप ?

             


वो
घरों में
बर्तन मांजती है
सड़क के किनारे
कुदाल चलाती है
ऑफिस की
सफाई करती है |
उसके
श्रम से
घर का चूल्हा जलता है
पैसे से
भाई बहन
विद्यालय जाते हैं
प्रार्थना से
देवतागण प्रसन्न होते हैं |
वह
बोझ है
मध्यवर्ग में
तृप्ति है
सड़क -छाप मजनुओं की
बहस का मुद्दा है
 बैठकों का |

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

एक औरत

वह औरत एक गृहणी थी
है भी 
कह सकते हैं ।
पति के साथ 
जीवन कटा 
घर या कहिये मकान बना ।
अब वह तैयार नहीं 
बेटे की कमाऊ पत्नी का घर 
बच्चे सम्हालने को ।
जीवनसंध्या में 
जिम्मेदारी !
कभी नहीं ।
पति रह लें 
सम्हालें बेटे के बच्चे 
अब और नहीं । 
अपना घर ,मकान 
अपना मान
अपना जीवन  है ।
जी रही है वो 
स्वाभिमानिनी 
लोगों की ईर्ष्या की पात्र ।
आजादी सुरक्षित रखना 
एक मनोबल 
एक अहसास है ।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

एक प्रश्न

           
विद्यालय में पढ़ा 
आसमान छूती महिलाएं ।
अख़बार दिखाते 
अपराध ,भ्रस्टाचार ,सनसनीखेज खबरें ।
साहित्यकार दिखाते 
रोती माँ, बहन ,टूटा समाज ।
समझौता करने लगता है मन 
रोना ही है नियति उसकी ।
पर मुस्कराएगी वह 
भले ही रोये मन ।
दया की पात्र नहीं बनेगी वह 
भले ही खंडित हो जाय।
आखिर क्यों मीडिया बहादूरी की खबरों से
नहीं रंगे जाते 
और अपराध पाता एक थोड़ी सी जगह ?
आखिर क्यों ?

गरीब

        

नैतिकता का पाठ 
विद्यालय में लगता है अच्छा
अभावग्रस्त घर में नहीं ।
छोटे छोटे झूठों के सहारे 
मुस्कराते भरे पूरे सफल रिश्ते 
खुशहाल घर 
चिढाते हैं मुंह।
कहाँ से हम करप्सन 
करेंगे दूर ।
जिसने दी रोटी 
उसी के हो लिए ।
इलाज तो है अमीरों की बपौती 
सपना भी देखते नहीं ।
हम स्त्री पुरुष मजदूर हैं 
हम सड़क दुर्घटना में मरते हैं 
या जीवनसंध्या में 
घरों के सामने घरों के सामने हो जाते हैं खड़े 
मिली भीख के बदले 
देते हैं आशीष ।

रविवार, 8 जनवरी 2012

सफेदपोश जन्मदाता की बुद्धिमानी

   

   खाली कमरे में इतना रोता है मन
   कि भरे  कमरे में
   सूने नयनों से
   निकलती हैं चिंगारियां |
   समाज के निश्चित चौखटों  में फिट होने हेतु
   मां बाप द्वारा बनायीं गयी सजीव  आकृतियाँ
   चौखटों के टूटते ही
   दिग्भ्रमित होने  लगती हैं
   और बनने लगती हैं ...आतंकवादी या समाज का  कोढ़ |
   क्यों न इन्हें स्वयंसिद्धा बनने दिया जाय ?....
    प्रश्न उठाता है कोई |
   जीवन के अँधेरे में चलती ये आकृतियाँ 
   प्रतीत होती हैं किसी पिशाच की सेना ...
   और तब विश्वास होने लगता है 
   काली शक्ति के अस्तित्व का |
  ओझाओं की बन जाती है चांदी |
  वे भी जीने  लगते हैं |