विद्यालय में पढ़ा
आसमान छूती महिलाएं ।
अख़बार दिखाते
अपराध ,भ्रस्टाचार ,सनसनीखेज खबरें ।
साहित्यकार दिखाते
रोती माँ, बहन ,टूटा समाज ।
समझौता करने लगता है मन
रोना ही है नियति उसकी ।
पर मुस्कराएगी वह
भले ही रोये मन ।
दया की पात्र नहीं बनेगी वह
भले ही खंडित हो जाय।
आखिर क्यों मीडिया बहादूरी की खबरों से
नहीं रंगे जाते
और अपराध पाता एक थोड़ी सी जगह ?
आखिर क्यों ?
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