बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

एक माँ


बेटा
हर माह आता है
हाथ में आये
पैसों का हिसाब मांगता है |
उसकी आवाज
अपने मृत पति के पैसों का हिसाब
देते वक्त मरी सी हो जाती है | 
बचे पैसों को ले
बेटा चला जाता है
बैंक में रख दूँगा कह |
वह
बैंक का हिसाब समझ नहीं सकतीं
अंग्रेजी समझ नहीं सकती
किसी पर विश्वास नहीं करती |
उसके लिए
पुत्री दूसरे घर की है
उसके पुत्र की हितैषी कैसे हो सकती है |
बेटे के जाते ही
वो शेरनी हो जाती है
कमजोरों को धमकाती है |
उसका
शरीर जब साथ नहीं देता
बेटी की समस्या को कर नजरअंदाज
उसे ही गुहार लगाती है |
फिर वह
कोई अपना नहीं कह 
गुहार लगाती है
हे ईश्वर उठा ले इस दुनिया से |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें