खाली कमरे में इतना रोता है मन
कि भरे कमरे में
सूने नयनों से
निकलती हैं चिंगारियां |
समाज के निश्चित चौखटों में फिट होने हेतु
मां बाप द्वारा बनायीं गयी सजीव आकृतियाँ
चौखटों के टूटते ही
दिग्भ्रमित होने लगती हैं
और बनने लगती हैं ...आतंकवादी या समाज का कोढ़ |
क्यों न इन्हें स्वयंसिद्धा बनने दिया जाय ?....
प्रश्न उठाता है कोई |
जीवन के अँधेरे में चलती ये आकृतियाँ
प्रतीत होती हैं किसी पिशाच की सेना ...
और तब विश्वास होने लगता है
काली शक्ति के अस्तित्व का |
ओझाओं की बन जाती है चांदी |
वे भी जीने लगते हैं |
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