मंगलवार, 31 जनवरी 2012

एक औरत

वह औरत एक गृहणी थी
है भी 
कह सकते हैं ।
पति के साथ 
जीवन कटा 
घर या कहिये मकान बना ।
अब वह तैयार नहीं 
बेटे की कमाऊ पत्नी का घर 
बच्चे सम्हालने को ।
जीवनसंध्या में 
जिम्मेदारी !
कभी नहीं ।
पति रह लें 
सम्हालें बेटे के बच्चे 
अब और नहीं । 
अपना घर ,मकान 
अपना मान
अपना जीवन  है ।
जी रही है वो 
स्वाभिमानिनी 
लोगों की ईर्ष्या की पात्र ।
आजादी सुरक्षित रखना 
एक मनोबल 
एक अहसास है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें