-इंदु बाल सिंह
आर्थिक रूप से गरीब को कोई नहीं पहचानता
वह , अस्तित्वहीन चलते चलते गिर जाता है
उसकी मौत का जिम्मेवार कोई नहीं होता
पर प्राण निकलते ही उस गरीब की अहमियत हो जाती है
उसके मृत शरीर को अपने पहचान लेते हैं
उसका क्रिया-कर्म करते हैं ...
अपनों को उस गरीब के भूत बन जाने का भय सताने लगता है ।
वह , अस्तित्वहीन चलते चलते गिर जाता है
उसकी मौत का जिम्मेवार कोई नहीं होता
पर प्राण निकलते ही उस गरीब की अहमियत हो जाती है
उसके मृत शरीर को अपने पहचान लेते हैं
उसका क्रिया-कर्म करते हैं ...
अपनों को उस गरीब के भूत बन जाने का भय सताने लगता है ।
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