सोमवार, 24 दिसंबर 2018

सपने बारम्बार जन्मते हैं ।

-इंदु बाला सिंह


हर साल सुनामी आती है

गुजर जाते हैं बहुत से अरमान ...

फिरअंकुरित होते हैं सपने

यूं लगता है मन धरती बन गया है ।



रविवार, 9 दिसंबर 2018

दूसरा जीवन युद्ध छिड़ा

- इंदु बाला सिंह

लो छिड़ा दूसरा जीवन युद्ध

चले हम ....

आज न संग कोई

हुये उन्मुक्त हम ....

बांध चले कमर में

आज तो कफ़न हम ...

छिड़ा युद्ध स्वाभिमान का .. मान का

लो बटोर चले हम तो यादों के लम्हे ....

जहां रात कटी वहीं बसा घर

हर भोर सामने नया मैदान था ...

हम तो  बनजारे हो चले





शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

जिंदगी

- इंदु बाला सिंह


जिंदगी ...एक बुलबुला है पानी का

सूरज की रोशनी में सतरंगी बन जाता है

सीपी में प्रवेश करते ही मोती बन जाता है ।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

छेड़ो न दीपक को

- इंदु बाला सिंह


जलने दो दीपक को

थोड़ा सा ही तो स्नेह है

खुद बुझ जायेगी वह आशा - लौ ...

तुम्हें उस दीपक से दिशा-ज्ञान नहीं चाहिये न सही

हो सकता है किसी भटके पथिक का वह  पथ प्रदर्शक बन जाये

छेड़ो न तुम लौ को .... दिख जायेगा तुम्हारा चेहरा हर किसी को ।


शनिवार, 17 नवंबर 2018

घर

- इंदु बाला सिंह

घर के लिये मकान जरूरी है

पर मकान के लिये  घर जरूरी नहीं .....

गजब है न ! लोग मकान में रहते हैं

पर वह घर सरीखा दिखता भर है ....

एक विचारणीय शब्द है घर

कभी समय मिले तो सोंचना तुम घर का अर्थ....

तुम घर में रहने की चेष्टा करना ।

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

बेटियां खुद आत्मनिर्भर हो जायेंगीं

- इंदु बाला सिंह

आजीवन युद्ध चलता रहा उसका समय से

पर जीतते गये उसके अपने , रिश्तेदार ..

कौन कहता है बेटे और बेटी में फर्क नहीं है

अखबार तो बस अखबार ही है .....

घून लगा है परिवार में

लड़की की जड़ें खोखली हैं ...बाकी सब दिखावा है

जैसे देश आजाद हुआ था

एक न एक दिन खुद बखुद आजाद हो जायेंगीं

बेटियां ...


आत्मनिर्भर हो जायेंगी .... एक दिन बेटियां ।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

नन्ही

-इंदु बाला सिंह

बेटी उतरी धरती पर

जन्मी खुशी ....

संग लाई वह .... एक अनजाना भय

न जाने कैसा होगा भविष्य ...

पिता उसके .....सुरक्षा कवच थे ...छांव थे

समय उसे ललकारता रहा ...

भय के क्रूर धरातल पर चलते रहे

 उसके फौलादी  पांव ....

अपने ... उसके गिरने के  इंतजार में रहे  ।