गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

ओ री ! प्यारी लड़की सुन !



- इंदु  बाला  सिंह

ओ री !
लड़की सुन !
कितनी प्यारी है तू
तू ही तो मुद्दा है
ड्राइंग रूम का
नुक्क्ड़ का
पान की दूकान का
स्कूल डेज का
कालेज लाइफ का
ओ री !
ब्याहता लड़की सुन !
कितनी प्यारी लगती तू
जब लौट के जाती अपनी ससुराल तू
मैके  का आंगन मुस्काता गमकता तेरे  जाते ही
मुक्त होती भाभियां
दीर्घ सांस लेते पिता
निश्चिन्त होती माँ
तेरे घाव को लोग भूल जाते
आखिर क्यों बतियायें
अरेंज्ड मैरेज है
सारा दोष उन पर आयेगा
ओ री !
प्यारी लड़की सुन !
वापस न लौटना
तू तो बतरस की है गठरी
आखिर कोई कितना ढोये तुझे
ऐसे ही चलती है दुनिया ..........
मैं भी तो तुझसे मुक्त हुयी
तुझपे लिख के । 

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

छाया ही है सच्ची गुरु


29 October 2015
10:07


-इंदु बाला सिंह 

देख के
होते कुपित या रूठते
सूरज को हम पे
सदा साथ रहनेवाली हमारी मित्र छाया
छुप जाती है पल भर में
और
समझा जाती है हमें ..............
कितना ही अपना कोई क्यों न हो
छोड़ देगा 
वह साथ हमारा
आ खड़ी होगी मुसीबत सामने हमारे ...........

छाया ही तो है
सच्ची गुरु
इस नश्वर जग में   |

ओ ! जानेवाले टूटते तारे



-इंदु बाला सिंह

ओ !
जानेवाले टूटते तारे
दे जाओ
कुछ भी
तुम जाते जाते
बस  जाओगे
तुम
मेरे अन्तस्तल में |

सपनों के कटघरे से मुक्त हुआ मन




-इंदु बाला सिंह

कहानी जली
जला  उपन्यास
टूटा मन
छपी रचनाएँ जली
गुम  हो गए हम
अपनों के खत जले
हस्तलिपियों से  आती महक गुमी
चित्र जले चिंदी चिंदी हो कर
अंतिम बार झांके चेहरे चिन्दियों से
और मैंने सोंचा -
साँसों से संबंध टूटने के बाद
काश ! देख पाती मैं खुद को जलते हुये…...........
सपनों के कटघरे से मुक्त हुआ मन
स्तब्ध सा
आज
आ खड़ा हुआ यथार्थ की जमीं पर । 

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

कागजी यादें




-इंदु बाला  सिंह

बेहतर होता है नष्ट  देना  कागजी  यादों को
सच्ची थी होंगी
तो
आयेंगी याद
बनेंगी
जीने  ऊर्जा
वर्ना आखिर कितनों को समेटें हम
अपने पिटारे में
सुविधाजनक होता है चलना सड़क पर
ले कर हल्के असबाब……
और देखते ही देखते धू धू जल उठीं यादें
एक तीली से....
आवाक खड़ा है मन ।


सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

गजब के पत्थर थे हम


27 October 2015
09:04

-इंदु बाला सिंह

न जाने किस मिठास की चाहत लिये
गुजरते रहे
महसूसते रहे
जीते रहे खट्टे अनुभव .........
खड़े रहे
देखते रहे मुंह फेरते रिश्ते
गजब के पत्थर थे हम
जो
इन्तजार करता रहा
जौहरी का
अपनी नियति का |

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

राजनीति अच्छी नहीं माओं से

- इंदु बाला सिंह

बांट दिया है तुमने औरतों को
जेवर
जरीदार कपड़े
थाली भर अन्न दे कर
और
राज कर रहे हो तुम ....
बेटियों से छीन  उनका हक
भर रहे हो  तुम
अपने बेटों का घर.......
राजनीति अच्छी नहीं माओं से
लड़ाओ नहीं तुम बहनों को अपने भाईयों से ।