गुरुवार, 10 जुलाई 2014

बिलौटा आया


10 July 2014
07:07
-इंदु बाला सिंह

पीछे का किवाड़ 
ज्यों ही बंद उसने ........
बाहर से
चीखी बिल्ली .......
माउं माउं माउं .........
अंदर से आवाज आयी ..........
म्याऊँ म्याऊं म्याऊं ........
चीखा बिलौटा
इतनी जोर का हल्ला
घबरा कर
मैंने खोला किवाड़
भागा
घर के अंदर से
मेरे पांव के बगल से
गिरता पड़ता बिलौटा ..........
ओह !
तो बिलौटे जी !
आप घर में
घुस कर निकलने का पाठ पढ़ रहे थे क्या !





पड़ोस के बच्चे प्यारे


09 July 2014
21:24
-इंदु बाला सिंह

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं
उन्हें
पड़ोसन से ज्यादा
पड़ोसन के बच्चे प्रिय होते हैं
ये अंकल बन बच्चों से बतियाते है ...........
न जाने किस मिट्टी के
ये बने होते हैं
और
अपने दिमाग में
न जाने क्या क्या .... 
ये तिकड़म भरे होते हैं |

पैरों का सुख


09 July 2014
10:58
-इंदु बाला सिंह

राहगीरों के लिए
शोक कैसा
मिले थे
बिछड़ने के लिए
हम भी बिछड़े थे होंगे
कभी
किसी के यादों से ..........
पथ  में
मिलनेवाला सम्मोहन
पथिक ही समझे ........
पैरों का सुख
स्वाभिमानी ही महसूसे |

जीने की चाह


09 July 2014
09:35
-इंदु बाला सिंह

कभी कभी
हमें गुम हो जाना अच्छा लगता है
भीड़ में भी रह कर अकेला होना भाने लगता है
अपनी पहचान खोना अच्छा लगता है
और
फिर
नये सिरे से
अपनी 
स्वयं की पहचान
हमें एक नया  इंसान बना देती है
हममें फिर से जीने की चाह जगाती है |

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

पहचान ढूंढें हम


09 July 2014
07:07
-इंदु बाला सिंह

हमने रिश्ते तोड़ा ..........
बचपन जला दिया
आग में
सुखों की चाह में .......
अब
ढूंढ रहे हम
अपनी पहचान
इतिहास की किताब में |

सिरचढ़ी सिरफिरी


28 June 2014
11:38
-इंदु बाला सिंह

ले आओ भई !
अब
अपने पूत के लिये खाना बनानेवाली
मैं तो न बनानेवाली
इस मुस्टंडे का खाना ........
माँ के मुंह से
इतना सुनते ही
कूद पड़ी सिरफिरी
अपने अजूबे सवाल से ....
और मेरे लिए
कमानेवाला कब आएगा ?
अरे !
तू न चिंता कर
जब तक
हम हैं
फिर तेरा भाई है न ..........
माँ के मुंह से
इतना सुनते ही
फिर कूदी अपने एक सिरदर्द सवाल के साथ .........
पड़ोस की आंटी
जब भी आती हैं
हमारे घर
क्यों कोसती रहती हैं
अपनी सास और ननद को .......
माँ अपनी सब्जी चलाने किचेन में चल दी .....
पिता अख़बार पढ़ने लगे
और
सरचढी सिरफिरी ने टी० वी० आन कर लिया |

आक्रामक सैनिक


17 June 2014
16:10
-इंदु बाला सिंह

हमारी
आँखों के आंसू
जब
दर्शक के सामने बहते हैं
आँखों से
तब
कहानियां बनते हैं
लोगों की सहानुभूति बटोरते हैं
अपनों की इर्ष्याग्नि ठंडी करते हैं
पर
वही आँसू
जब हमारी आँखों से
अकेले में बहते हैं
तब
वे
पानी बन जाते  हैं
और
हमें  फौलादी  बनाते हैं ........
हमें जीवन - जंग का आक्रामक सैनिक बनाते हैं |