शनिवार, 22 सितंबर 2012

हाइकू - 35


छूने को नभ
विपत्ति ने दी तुझे
उर्जा उड़ने की |

आहुति देना
जले दुर्गुण नित
कर्म अग्नि में |

चलते जा तू
रुकना तो मौत है
सुन रे प्राणी |

कर न विदा 
फिर सुबह होगी
हम मिलेंगे |

घुट्टी


घुट्टी में देते
हम झूठ संतान को
अनचाहा मेहमान आये तो
हम कहते
बेटा कह दो
पापा घर पे नहीं हैं
रिश्तेदार छुट्टी में आनेवाले हों तो
हम कहते
असल में हमारे टिकट की बुकिंग है
दार्जिलिंग की
बच्चे खुश हो जायं सुनके तो
हम कहते
चुप ! हमने तो बस ऐसे ही कह दिया
और भी ऐसी ही कितनी बातें सुनता
भौचक बल मन
धीरे धीरे वह भी सीखता
काम निकलने के गुण
अत: चौकन्ने रहें घर में
औलाद हो तो |

एक महिला का युद्ध


पति की आंख बंद होते ही
ससुराल की रानी बनी
श्री हीन
हुई अवहेलित धनी ससुराल में
सास ससुर ने मुंह फेरा
देवर देवरानी का
चलने लगा सिक्का
उसका पुत्र
बना गूंगा
मैका भला क्यों पीछे रहे
ताने में
इतने बड़े घर की बहू
है वहीं रहे |
उसकी नौकरी ही
बनी सहारा उसकी
सहकर्मी बांटे परेशानियां
मिला घर
पर
जितने मुंह उतनी बात
हाय ! अकेली औरत
अकेले रहती
अलग घर में ऐसा क्यों आखिर ?
जरूर कोई चक्कर !
............................
दिन बीते , मास बीते
बीते वर्ष
आज उसका पुत्र
है सरकारी कर्मचारी |
कितना कठिन होता है
जीना
औरत के लिये
सतत करती वो युद्ध
अपनों से
समाज के नापाक इरादों से
आज वो महिला
है उदहारण
औरों की
जो जिंदगी भर जली
स्व के लिये
आज प्रिय पात्र है
पुत्र के सहकर्मियों की |



गुरुवार, 20 सितंबर 2012

ठगे जा रहे हैं


महिलाएं
काम के बोझ से
ज्यों ज्यों लदती गयीं
त्यों त्यों जीवन का स्तर उनका उठता गया
वे असहिष्णु होती गयीं
कटती गयीं अपनों से |
ये कैसी चाहत
वे रिश्ते
सुख पहुंचा सकते थे जो
असह्य लगने लगे
अपने खोने लगे |
मन पर चलने की प्रवृति
अनजाने में
हम बोने लगे
औलादों में
जब चाहे नौकरी छोड़ें
जब चाहे जीवन साथी |
कहीं कहीं कुछ तो अभाव है
हर महिला में
जो करती राजनीति घर में
तिस पर भी
आखिर क्यों रह जाती वो अकेले
जीवन के किसी मोड़ पर
ठगी जाती वो
सड़क पर |

बुधवार, 19 सितंबर 2012

हाइकू - 34


गणेश देव
मैं खाना चाहूँ लड्डू
आंख मींच तू |

हे गणपति !
उत्तर पुस्तिका में
अंक बढा दे |

कालेज छूटा
मस्ती के दिन बीते
माँ ,बाप छूटे |

पढाई खत्म
हुए आज पराये
कमाओ भई !

रिश्ते


सास को लगाना पड़ जाय फांसी
ऐसे पति ,पुत्र , बहू 
किस काम के
घर में बैठी रहे 
बिन ब्याही कमाऊ बेटी
लानत है
रिश्तों को |
क्यों रहें हम अकेले
अलग घर में
खुश रहें
बांटे आपसी सुख दुख
हंसें बोलें
दूरी बढ़ाये मिठास
अब रही
सहिष्णुता पुरानी
थक कर सोते
हम
निज घर में |
अखबार की हर
खबर दिल को छूए
लगे कहीं कोई अपना रोये
काश हम पत्थर बनते
मुंह ढांप के सोते
सबेरे कहते
...हाय फुर्सत ही कहाँ मिली अखबार पढ़ने की  !

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

पेट्रोल ! पेट्रोल !


लाते तेल विदेश से
पानी जहाज द्वारा
कितनी मुद्रा देते हम विदेश
सोंचना हमारा काम नहीं
सरकार सोंचे |
पेट्रोल का दाम बढ़ा !
डीजल का मूल्य बढ़ा
गैस सिलिंडर पर नियंत्रण हुआ !
चिल्लाये हम
मंहगाई आई
ये तो सच है उतना
जितना
इन प्राकृतिक संसाधनों का
असंयमित प्रयोग |
हमारे जेब पर चोट पड़ी
हमारा चिल्लाना वाजिब है
मध्य वर्ग पर जब जब पड़ी है चोट
उसने निकला भी है नया रास्ता
रसोईं में जलते चूल्हे
सड़क पर दौडती गाड़ियां
न जाने क्यों
याद दिलाएं मुझे उन तेल कर्मचारियों का
जो शहर से दूर अथक परिश्रम करते
तेल शोधन करते
उनके परिवार के बारे सोंचना
हमारा काम नहीं
तेल कंपनी सोंचे |