तेरही बीती
मित्र आये पुत्र के
पुत्री पत्थर |
वाह रे पिता !
दिखाया रूप तूने
भूला बेटी को |
नित क्यों मारे
इससे भला माते !
कोख
में मार |
कैसा पिता है !
किया तुने
भिखारी
निज
पुत्री को |
दसरथ सा
बांधा
निज को मैंने
दिया वचन |
वक्त सिखाये
हमें लचीला होना
साख
रखना |
आधा अनंत
तुमने छीना है जो
वो तो मेरा है |
पहचानूँ मैं
घर
, बाहर ,जग
तू क्या सुझाए |
माँ अच्छी होती
कहानियों में सदा
सत्य में स्वार्थी
यह भोगा यथार्थ
अपचनीय
लगे |
पुत्र ही प्यारा
सम्पति का
वारिस
लाज क्या चीज
पुत्री प्यार
की भूखी
है
पढ़ी लिखी मुर्ख |
रक्त- सम्बन्ध
प्राय: शोषण करे
हमें मिटाए
ये पहेली जो बूझे
वो ही जी ले जीवन |
बीमार तन
याद दिलाये कल
है वो निरीह
क्या पता
क्या ताकता
कल का अग्नि-पुंज |
वक्त से युद्ध
में घायल
सिपाही
पड़ा घर में
कराहे निशदिन
देख
जरा विधान |
क्या करूं भाई
!
बुढापे में
बीमारी
नर्क में ही
हूँ
स्वावलंबन गया
न भोगे
कोई ऐसा |
तेरी जीत पे
ज्यों ही
कूकी कोयल
मैं नाच उठी |
न ली ईश से
जब मैं अहसान
तुझसे
क्यों लूँ |
छूने को
चन्द्र
है सागर विह्वल
उड़े मन भी |
सांवली रात
मन की पीड़ा हरे
चित्त हो शांत |
संग संग खेले
बड़े हुए
एक घर में
किस्मत दोनों की अलग
ये कैसा अन्याय
समाज का |
चल हम दोनों लड़ें
इसी घर में
इस समाज से
एक सरीखे हक
मान छीनें
रिश्तों
से |
तेरी हार में
है किसी का आनन्द
किसी की जीत |
योगी का मन
कर्मक्षेत्र
में लीन
कब भटके !
जग न रुके
निज भी न तड़पे
निज के लिये |
डिग्रियां खोंस
फूलों संग बालों में
इठलाई वो |