सोमवार, 26 मार्च 2012

युवा


सदा मन करता है
गुलाम रखने का पास
स्त्री हो या पुरुष |
इतिहास मानो सोया रहता है
मन में
मौका मिलते ही जग जाता है|
आज है मानव
सवार विज्ञान पर 
दूर करना है उसे गरीबी ,और धर्मान्धता |
स्त्री पुरुष एक सिक्के के दो पहलू
एक तरफ घिसा तो
खोटा कहलाया |
क्यूँ न लें हम गोद
एक प्राकृतिक आपदाग्रस्त औलाद को
अनाथालय की क्या आवश्यकता |
घर में स्त्रियों को सम्मान दें हम
नारी - निकेतन
न जन्म दें |
हम सबल नहीं तो
हमारा घर सुरक्षित नहीं
आपसी इर्ष्या मिटा देगा निशां मानवता का |
समाज सेवा कौन सा नारा है
अपनी सेवा करें
हम से समाज है |
हम स्वस्थ हैं
प्रसन्न हैं
समाज भी स्वस्थ है प्रसन्न है |
हम से है बनी
दुनिया
दुनिया से हम नहीं |
ऐसा है स्वप्न
इसे ही 
हर काल में हमने किया है सत्य |
हम हैं युवा मतवाले
किसके रोके
रुकनेवाले |

रविवार, 25 मार्च 2012

बेटी


सास है
बहु है
बेटा है
माँ है
पिता भी है
समग्र अच्छाइयों और बुराइयों के साथ
पर बेटी कहाँ ?
अरे !  
वो तो दान कर दी गयी थी
कितना पुण्य मिला था !
स्वर्ग में एक स्थान भी
आरक्षित हो गया था
अब कोई चिंता नहीं
जिसने बेटी नहीं पैदा की वो चिंतित हों |
अरे !
देखो मिल गयी बेटी
कानून की किताब में
पर इस निर्जीव का करूँ क्या
साधक ही नहीं कोई
पर धन्यवाद  का पात्र है वो बुद्धिजीवी
जिसने एक जगह दे दी उसे |

मंगलवार, 20 मार्च 2012

घर


आज शरणस्थल है
घर
निष्कासितों का |
यह ऊष्मा नहीं देता
केवल रोकता है
आपदाओं को |
महानता का मापदंड
व्यक्ति  के
घर की विशालता है |
रोशनी से जगमगाते मकान
दर्शक का मन खुशी से
भर देते हैं |
क्या इन घरों में
सम्वेदना ,इमानदारी का
निवास है ?

एक

१९८४


एक ही दीपशिखा
देती है प्रकाश
हरती है निराशा का अंधकार
जलाती भी है किसी का घर |
एक ही मशाल
देती है आत्मविश्वास
या फिर जलाती है स्वाभिमान |
एक लकड़ी कमजोर नहीं
जब उछल कर
पड़ती है सिर पर
तब आते हैं दिन में तारे नजर |
एक के पीछे चलती है
दुनियां
दस के पीछे
कोई नहीं |
एक
बेजोड़ है
इस सरीखा
कोई नहीं |
न कर अनुताप
अकेलेपन का तू
रख तो पहला कदम
सारी दुनियां ही है तुम्हारी |

सोमवार, 19 मार्च 2012

पत्नी

घर में पत्नी सदा होती है प्रिय
कमाऊ है तो और ज्यादा |
उसके कन्धों के पीछे से चलाया जा सकता है तीर
अपनों पर |
कौन रिश्तेदारी ढोए
ऐसे ही समस्याएं कम हैं क्या ?

रविवार, 18 मार्च 2012

युद्ध छावनी से एक पत्र

१९९० .

क्या लिखूं मित्र
लेखनी लिखती ही नही
केवल कागज भिगोती है |
ऐसे ही क्या कम भींगी हू |
मैं कुछ न लिखूंगी
कुछ न कहूँगी
कुछ न सुनूंगी
भय है कहीं छलक न जाये
सब्र का प्याला
और ज्वालामुखी में तुम भस्म हो जाओ |
रहने दो मुझे मौन
मैंने विषपान किया है
बोलूंगी तभी मैं
जब शिव सा धारण कर लुंगी |
मित्र जंग छेड़ा है तो
जीत कर ही आऊंगी |
तलवार का लहू देता है
मुझे आत्मतृप्ति
एक हिंसा
एक नशा |
मतवाली हूँ मैं
मेरी राह में न आना
रक्त तिलक लगाया है मैंने
अपने ही लहू का |
मेरे नाम का हार
हर दिन गूंथना
क्या पता मैं कब लौट आऊँ जीत कर
और तुम्हारे पास पहनाने को हार ही न हो |
मित्र मैं न आई तो
मेरी रत्न जड़ित तलवार
तो आएगी ही तुम्हारे पास |
तुम हार मेरे चित्र पर चढ़ा देना
और तलवार अपने बैठक -घर में सजा देना |
हो न हो
किसी आगंतुक को
उस तलवार की आवश्यकता पड़ जाय |
जंग छेड़ा है तो
जीत कर ही लौटूंगी
ऐसा दृढ़ विश्वास है |
मुझे मौन रहने दो
अन्यथा मेरी आवाज
हर घर से निकालेगी
एक इंकलाबी
और फिर प्रलय हो जाएगा |
मेरी लेखनी खून में डूब जायेगी |
मंगल कमाना करो मित्र
द्ग्विजय का सेहरा बांध कर लौटूं मैं |


शुक्रवार, 16 मार्च 2012

तू

१९७६

खोजा तुझको व्यर्थ ही
मंदिर ,मस्जिद .गिरिजा में
मिल गया तू
विज्ञान की हार में
अदृश्य और अप्राप्य में |