गुरुवार, 7 जनवरी 2016

भोर का इन्तजार


07 January 2016
22:05

-इंदु बाला सिंह


न जाने कैसा प्यासा पल था वह
और
पी ली थी
मैंने सम्मान की ज्वाला ...........
धधक रही है अब तक
वह
सुलगते रहते
मन के अवसाद ..........
सोता है ज्वालामुखी अंतर्मन में
अंधियारे में शीतल लेप लगाती
चेतना बेसुध करती
सुला देती तन ........
पर
मन न सोता
इन्तजार करता
वह
भोर का |

बुधवार, 6 जनवरी 2016

कमा के लौटा है बेटा



-  इंदु बाला सिंह



बेटे के
जेब  का रुपय्या
नचाता
सबको ता  ता थय्या
दी जे वाले बाबू  ...जरा गाना बजा  ...........
पिता माता बहन सभी निकटस्थ.......... मुस्काते  ........ मॉडर्न बन जाते
अब रुपय्या आया कहां से    ......... इसका जिम्मा तो लानेवाले के सर पर है
काश
ऐसे हर घर में बनता एक वाल्मीकि  ...........
खोते मात पिता   ......... अपना गृहस्थ लाल
और
चेतती हर माँ   ...... हर पिता   ........ हर बहन । 

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

आखिर चिराग ले के क्यूं ढूंढते दामाद




-इंदु बाला सिंह

लड़का तो ठीक है
पोस्ट ग्रेज्युएट है
नौकरी नहीं  करता है
पर
ड्राईवर है उसका बड़ा भाई
कोई नौकरी न मिले  लड़के को
तो
घुस जायेगा
वह भी
अपने बड़े भाई की तरह ड्राईवरी में  .......
यही ठीक नहीं  है ........
लड़का ठीक है
अपना धंधा करता है
ढेर सारे भाई बहन हैं तो क्या
अपना मकान  है
अपनी कार है
अरे  काम धंधा  न चला
तो
ड्राईवरी कर लेगा  ........
आखिर चिराग ले के क्यूं ढूंढते दामाद
लड़की के पिता
और
पांव पूजते
ससुर  दामाद का ।

समय के बीज



- इंदु बाला सिंह

ये कैसा क़ानून है
जो जीता है
स्वार्थी की जेब में    ..........  क्रूर हृदया के पर्स में  ......
ऊंघता है लाइब्रेरी की पुस्तकों में  ..........
फिर
लाइब्रेरी तक पहुंच कर लौटने के लिये
पेट और  जेब का भरा होना भी उतना ही जरूरी है
जितना
आँखों में रोशनी होना   ........
और
तब बेहतर लगने  लगता है
बोना
समय के बीज अपने पैताने  । 

तीसरा कदम रखने के लिये जमीन की जंग





- इंदु बाला सिंह


जीने की कश्मकश में
छोड़ दिया था
मैंने
देखना आईना
और
आज
अपने प्रिय लेखकों के  चित्र
देख फेसबुक में
अचंभित हुयी  .........
अरे !
तुम्हारे बाल सफेद गये  ...........
तुम
इतनी उम्रदार हो गयी
और
तुम !
तुम्हारी तो बरसी भी बीत गयी  ..........
ओह !
मतलब
मैंने  कीमती पल खो दिये     ........
बाईस वर्ष की उम्र में
पहुंच गई  मैं
जब
आरम्भ हुयी थी
तीसरा कदम रखने  लिये
जमीन की जंग    ..........
जो
अब भी वह जंग जारी है  ...........
आखिर कब तक !
कब तक ?
शायद आख़िरी सांस तक   ........
फिर से खो गयी
मैं
अपने  दैनिक संग्राम में  । 

सोमवार, 4 जनवरी 2016

मन है तो रोशनी है



-इंदु बाला सिंह



मन की चाह ही जलने को प्रेरित करती है दीये को
और
तेल मिलता है दीये को.........
मन
गलाता है  स्वंय को
जीता है
रोशन करता है
हर निकटस्थ की राह   .........
जब तक तन  है
तब तक
मन है .........
और
मन है
तो
रोशनी है  । 

रविवार, 3 जनवरी 2016

हाथ सफाई करना सीख




- इंदु बाला सिंह



मन की आँखें खोल
ओ रे ! ........ बिसुरनेवाले  प्राणी  !
हाथ सफाई करना सीख
इतना  मनोबल बढ़ेगा तेरा
कि
तू हैरत में पड़ जायेगा
इस जिले का सामान उपहार दे तू
दूसरे जिले के अपनों को
बदले में मिलेगा
तुझे भी तो उपहार दूसरे जिले के निवासी से
रेडीमेड कपड़े कट के बन जायेंगे  तेरे बच्चों के साइज के
कलम लिखने के काम आएगा
और
बर्तन तेरे किचेन का स्टैंडर्ड बढ़ाएगा  .........
बच्चे तेरे स्कूल में पढ़ते हैं न
भले  ही महीने में एक बार स्कूल जाते हों वे
आखिर साल में एक बार स्कूल यूनिफार्म मिल ही जाता है
वे
बाकी समय
सड़क पर दबंग बने घूमते हैं
तो क्या हुआ
तेरे घर की सुरक्षा करते हैं
फेल होने से भी
क्लास प्रोमोशन मिल जायेगा ही उन्हें
नवीं क्लास पहुंचते पहुंचते साईकिल भी फ्री मिल जायेगी
घर में जितने बच्चे
उतनी साईकिल  ..........
हाथ सफाई को चोरी कौन कहता है
पकड़ में आयेगी
तभी न चोरनी कहलायेगी तू
ओ ईमानदारी के पुतले बने जीव !
जीना सीख
कामवाली से काम निकालना सीख
आँख निकाल के लड़ना सीख
धमकाना सीख
जीना सीख ।