गुरुवार, 9 जुलाई 2015

भूल चली आनेवाला कल


09 July 2015
13:32

-इंदु बाला सिंह


बसी जब से
समन्दर किनारे
रात में
वह अपनी आवाज से डराने लगा
याद आये
भूत प्रेत
और
सुनामी
भयभीत हो
भूल चली
मैं
आनेवाला कल
और
देखते ही देखते
रात में
अच्छी नींद आने लगी |

बुधवार, 8 जुलाई 2015

ज्ञान की शीतल हवा


09 July 2015
11:11

-इंदु बाला सिंह


अंतर्मन चटकता नहीं है ......
गल जाता है
पढ़ विभाजन की कहानियां
परिवार का विभाजन हो
या
सम्बन्धों का विभाजन
अलगाव
तो अलगाव ही है
विश्व बंधुत्व कहाँ छुपा है
किशोर मन है सोंचता ................
क्या हम स्वार्थी नहीं बन रहे !
दोषारोपण से
मेरा दोष कम नहीं होता .............
जुड़ाव में
है सकारत्मक शक्ति
और
अलगाव में है नकारात्मक शक्ति
शक्ति तो दोनों प्रक्रिया दे ..............
स्वार्थ की
नकारात्मक गर्मी .......
घाव .......
दे हमें कैंसर  
तो क्यों न हम खुद का तन शीतल करें
ज्ञान की शीतल हवा से |

अद्भुत सेनानी


09 July 2015
07:26

-इंदु बाला सिंह

बाँध
पीठ पर पुत्र और पुत्रियां
वह
निकल पड़ी थी एक दिन ...............
और
भीड़ गयी थी
वह समय से लक्ष्मीबाई सरीखी
थाम
हाथ में हथियार
चली
करने साबित कलम की शक्ति
वह अद्भुत सेनानी ............
और
भिड़ंत हुयी
उसकी
अपनों से ...........
परायों से .............
समस्या के बादलों में
खामोश चमक बरस जाती थी
वह अद्भुत सेनानी सब अवरोधक पर ..........
देखते ही रह जाते थे
हो मौन
निकटस्थ उसे
अपने ड्राइंग रूम के झरोखे से ........
माना
एक दिन जीत लिया उसने
खेती लायक क्षेत्र
पर
एक शाम
अनुभव हुआ उसे ............
सेनानी तो आजीवन सेनानी रहता है
और
तब से वह
सदा दौरा करती रहती है
अपने इलाकों का |

सोमवार, 6 जुलाई 2015

रोपे गये पौधे



07 July 2015
07:05

-इंदु बाला सिंह



लड़की रोपते हैं
हम
अपनी चाहरदीवारी में ......
कालान्तर में
विशाल फलदार वृक्ष बन जाती है वह .............
कभी कभी
वह बरगद भी बन जाती है .........
हैरत होती है ........
एक जगंह से
उपार कर
घरों में रोपे गये चारा को
अपनी मिट्टी से कटने के बाद भी
इतना विशाल बनते देख  |

भींगा पन्ना


06 July 2015
17:12

-इंदु बाला सिंह

बादल
उमड़ घुमड़ ......
टकराते हैं
जब जब पहाड़ से ..........
भींग जाता है मन का पन्ना
शब्दों की बारिश से |

रविवार, 5 जुलाई 2015

मानवी और चिड़िया


06 July 2015
11:47

-इंदु बाला सिंह

काश !
वह चिड़िया होती !
पेड़ पर घोंसला बनाती चिड़िया को देख
सोंचा उसने  ........
पर
उसे तो
अपना मकान बनाना किसीने सिखाया ही नहीं
बस
एक मकान से उठा कर
बैठा दिया किसी दुसरे मकान में .............
आजीवन वह अहसानमंद रही
अपने मकानमालिक का  
बारम्बार जीती रही मरती रही वह
दुसरे के मकान में
अपमानित हो कर  भी ........
शायद यही उसके दैव को मंजूर था
वह मानवी थी न |


बुधवार, 1 जुलाई 2015

महानगर में माँ ही प्रकृति है


02 July 2015
07:18


-इंदु बाला सिंह


गाँवों से दूर महानगर में
संतति के लिये
माँ ही एक विशाल जंगल है .......प्रकृति है
हर संतति जिसके
मैदान में बकैयियाँ चलती है ... दौड़ लगाती है
पहाड़ पर पर्वतारोहण करती है कभी पीठ पर गमछे में बंध कर .... कभी अपने पावों से
सरिता में छ्पप्क छांयी खेलती है ...कभी सुनहरी मछली सरीखी तैरती है
विशालकाय वृक्ष की डाली में झूला झूलती है .... कभी टहनियों में लुकाछिपी खेलती है |
संतति
मुस्काती है ....हंसती है
और
उसके संग संग माँ गमकती है .....
हर माँ का घर एक विद्यालय होता है .... उर्जा का श्रोत होता है |