सोमवार, 2 जून 2014

वह पुस्तक विक्रेता


02 June 2014
14:16
-इंदु बाला सिंह

सड़क के किनारे
जमीन
छेक कर बनायी गयी
दुकान की
गुमटियों के पंक्ति की
एक बड़ी सी
टीन की गुमटी
और
उसमें बिकनेवाली
पुरानी
कुछ
चमकती हुयी
तो
कुछ
पीली पड़ी
बच्चों के लिए
चित्रकथाएं
पत्रिकाएं
महिलाओं के लिए 
पत्रिकाएं
युवाओं के लिए
उपन्यास
छात्रों के लिए
आठवीं से बारहवीं तक की
सी० बी०  एस०  इ०
और
आई० सी० एस०  इ० 
की किताबें
विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की
किताबें
कंप्यूटर की पत्रिकाएं
मैदे की लेई से
चिपकाते
बाईंड करते
और
बेचते
उस पच्चीस वर्षीय युवा को
एक नई पुस्तकों की
बड़ी सी
दूकान का मालिक बनने में
कालेज में 
पुस्तकों के सप्लाई करने
और
पुस्तकों का स्टाल लगाने का टेंडर लेने में
उसका अथक उत्साह
और
परिचय रंग लाया .........
मात्र दस वर्ष में ही
देखते ही देखते
वह
सड़क के किनारे
रद्दी से किताबें खरीद कर बेचनेवाला
युवा
एक समृद्ध पुस्तक विक्रेता बन गया
और
बेरोजगारों के लिए
एक अनूठा उदाहरन बन गया .......
आज भी
उस के दुकान का
एक रैक
छात्रों की
पुरानी पुस्तकों से भरा रहता है ......
आज भी
परीक्षा फल निकलने के बाद
एक चौथाई दाम में
छात्रों से
खरीदी गयी
ये
रीप्रिंट वाली पुस्तकें
वह
बड़े आराम से बेचता है
और
अपने
पुराने कौशल को याद रखता है |

घर


31 May 2014
20:55
-इंदु बाला सिंह

घर क्या चीज है
बेघर से पूछो
हम तो
यादों में ही
अपना घर लिए फिरते हैं |

सबल और दुर्बल


30 May 2014
22:19
-इंदु बाला सिंह

सबल
और
दुर्बल
डिक्शनरी के
ये दो शब्द पढ़
हम
ढूढने लगते हैं
इन दो श्रेणियों में
अपना स्थान .....
हमारी
ये दो श्रेणियां
मात्र हमारी मानसिक उपज की
आपसी रंजिश का अंत
सबल द्वारा 
दुर्बल के
बलात्कार से प्राप्त
आत्मिक तुष्टि में होती है .......
जिस दिन
दुर्बल शब्द
हर व्यक्ति की
डिक्शनरी से मिट जाएगा
उसी दिन
सबल शब्द भी
अपना अस्तित्व देगा .........
तो
क्यों न
आज
हम
अपनी इस
सबल दुर्बल की मानसिकता को
मिटा दें
वर्षों से चले आ रहे
इन दोनों  शब्दों को
अपनी डिक्शनरी से हटा दें |







स्त्री चेतना


28 May 2014
11:32
-इंदु बाला सिंह

सास के सुख दुःख में
हंसने रोनेवाली
बहू
जब तक
सास बनी
तब तक
युग परिवर्तित हो चुका था
और
पुत्र द्वारा नियुक्त 
कामवालियां
सास के साथ जीने लगी थीं
अपनी पगार लेने लगी थीं ..................
सास ने
अपने ही घर में
अपना वर्चस्व
और
बहू नाम की मिठास को
खोने लगी थी ........
देखते ही देखते
घर के बाहर और भीतर
युवाओं का
युग आ गया था ........
ये कैसी समाज चेतना थी
जो
मजबूती के नाम पर
दिलों को
भावहीन कर रही थी  |

सपनों का पहाड़



27 May 2014
11:42

-इंदु बाला सिंह 

उसके सपनों के पहाड़ 
की कहानी 
सुन हंसते थे सब ..........
इतने ऊंचे पहाड़ ने
उसे जब नौकरी न दिलायी
तब
वह
प्रतिदिन
अपने उस सपनों के ग्रेनाइट के पहाड़ का
एक टुकड़ा
समय को बेच देती थी
और
अपने परिवार का पेट पालती थी .........
यह अजूबा धंधा
जग
इर्ष्या से
देख रहा था
और
उसकी औलादें
सीढ़ी डर सीढ़ी चढ़ रहीं थीं |

मोहग्रस्त शिक्षक


27 May 2014
07:19

-इंदु बाला सिंह

शिक्षक !
तू
भुलावे में क्यों जीता .......
ज्ञानी
साधारणतया भूखों मरता ........
तुझसे
ज्ञान पा
छात्र
अगर तेरा अहसानमन्द रहते 
तो
तुझसे ज्ञान प्राप्त
हजारों छात्र
किसी दिन
तुझे
अकेला न छोड़ते
हर दिन तेरा
ड्राईंग रूम तेरे छात्रों से गुलजार रहता
अपने जन्मदाता से
मुंह फेरनेवाले
तुझे क्या याद रखेंगे ........
ज्ञान देने की
तूने तनख्वाह ली
या
ज्ञान दान दिया
यह
तेरी जरूरत थी
तेरा अपना शौक था ..........
आशा
ने
निराशा को जन्म दिया
का
दूसरों को
पाठ पढ़ानेवाला
आज
अपना पाठ
कैसे तू भूल गया
खुश रह तू
तुझ पर टिकी है
तुझे देख रही
आज
आनेवाली पीढ़ी |



आम लडकियां


22 May 2014
07:03

-इंदु बाला सिंह

आम लडकियां
हंसमुख और निश्चिन्त
होती हैं ........
एक खूंटे से बंध
वे
जीती हैं अपना जीवन ......
कूलर की ठंडी हवा में ही
वे 
जुगाली करती रहती हैं
और
खूंटे की
सलामती के लिए
व्रत त्यौहार करती रहती हैं ........
वैसे
जंगल है न
खूंटे की
अनुपस्थिति में
दैव को कोसती हुयी
समय के सहारे भी
जी ही लेती  हैं लडकियां |