रविवार, 6 अप्रैल 2014

पुत्र प्रेम


कहते हैं माँ
तो
माँ ही होती है
पर एक समय
ऐसा भी आ जाता है
जब
माँ
माँ नहीं मित्र बन जाती है
और
अपनी ही पुत्री से
इर्ष्या करने लगती है
उसके अर्जित धन की लुटेरी
बन
पुत्र के नाम
अपने धन जमीन की वसीयत लिख जाती है
सोंच में हूं
ऐसी माँ को किस नाम का
सम्बोधन दूं |


गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

अपरिचित मित्र


कुछ लोग ऐसे भी होते हैं
जो 
राह चलते
किसी की मदद कर आगे निकल जाते हैं
पल भर को मिलने वाले
ऐसे अपरिचित मित्र
हमें आजीवन उदास पलों में
याद आते हैं ........
हमारे मन में
जीने की चाह जगा जाते हैं |

ठसक


शान की बात है
उनके  लिए
क्यों कि
उनके पास चार मकान हैं
पर
वे रहते हैं एक मकान में ही |
तीन मकान में                                                                    ताला लगा रहता है
और
उन खाली मकानों को
जितना घूरती हैं
लोगों की तरस भरी निगाहें
उतना ही बढ़ता जाता है
मेरा स्टेटस
क्योंकि मैं भी
मकान मालकिन हूं |




बुधवार, 2 अप्रैल 2014

तीसरे दर्जे की नागरिक


घर की
तीसरे दर्जे की नागरिक
पति की अनुगामिनी
पुत्र के सुख में
आजीवन अपना सुख तलाशती
स्त्री
अनजाने में
दे ही जाती है
अपने संस्कार की वसीयत
अपनी पुत्री को
और
वह नवयुग की पुत्री
पढ़ लिख कर
आर्थिक रूप से
आत्मनिर्भर रह कर भी
बनी रहती है
अपने घर में तीसरे दर्जे नागरिक |

रैली


मेसेज आया है जी !
हमारे मोबाइल में
परसों पार्टी की रैली है
देखो कितना याद रखते हैं हमें
हमारे नेता गण
लेकिन कैसे जाउंगी मैं
इतनी दूर
दुसरे जिले में
और
मुझे याद आ गयी 
वह ट्रेन यात्रा
जिसमें एक स्टेशन में
चढ़ गया था
युवक युवती व वृद्ध वृद्धा का जत्था
सब ढकेल रहे थे
एक दुसरे को
बूढ़ी महिलाओं को गोद में उठा कर
डिब्बे की ऊपर वाली
सामान की बर्थ पर बैठा दे रहे थे
जनरल डब्बा
ठसा ठस भर गया था
बगल के सहयात्री से पता चला
वे किसी रैली में भाग लेने जा रहे थे
बस एक घंटे बाद
उनका गन्तव्य आ गया
और वे उतर गये |



झांकोगी कब तक ?


झरोखे से !
झांकोगी
आखिर कब तक
और
इन्तजार करोगी
किसी राजकुमार का
जो
तुमको बाईज्जत सड़क पर ले जाये ........
खुद सड़क पर
अपना विशालकाय रूप दिखा
तू ..............
अंश है
तू भी
शक्ति पुंज का ......
तू
सजीव है ........
अपने ही मान का
पर्याय है तू
फिर
किस बात का है
भय तुझे |

पकड़ में न आऊं मैं


एक गाय पर
डाल फंदा
नायिलन  के मोटे तार से
चार पुरुष
खींच रहे थे
अद्भुत नजर था
कौतुहल भरे मेरे नेत्र देख रहे थे
नवरात्रि के त्यौहार में
गाय को पकड़ने का दृश्य .....
तभी
दिखी मुझे
थोड़ी दूरी में खडी एक मिनी ट्रक
जिसमे में दो गायें लदी  थीं
इधर
फंदे में फंसी गाय
उछली कूदी
पर निकल न पायी तार के फंदे से
चारों पुरुष
खींच कर लाये गाय को
ट्रक का पिछला हिस्सा खुला
प्लाई का पट्टा गिरा
अब
इस पर से
चढना था गाय को ट्रक में ......
पहले दो पुरुष चढ़े
ट्रक पर
खींच खींच हारे
गाय को उपर
पर
बैठ गयी
वह फंदे में फंसी गाय
प्लाई के पास ही ......
उपर से खींचा गया
गाय को रस्सी से
नीचे पूंछ उमेठी गयी गाय की
पर अड़ गयी
वह गाय
हिली न डुली अपने स्थान से
पल भर को लगा मुझे
अरे !
उफ्फ !
खींची जा रही थी गाय
और
उसकी मजबूरी की
मैं
दर्शक थी
दस मिनट चला यह दृश्य
कितनी कारें
गुजर गयीं बगल से
हार कर
छोड़ दिया
उन कांजीहाउस के कर्मचारियों ने
उस जिद्दी गाय को
और दो पकड़ी गयी गायों के साथ
स्टार्ट हुयी
वह कांजीहाउस की मिनी ट्रक
पर
उससे पहले
मेरे सामने से भागती हुयी गुजर गयी
वह बहादुर गाय
मैंने देखा उसे पास से
आश्चर्य से
उस
बहादुर जानवर को
उस
शक्ति के प्रतीक को
उफ्फ !
वह गाभिन थी |