शनिवार, 7 सितंबर 2013

बाँटना चाहूं सुख

1990

सुख बांटने को जी चाहता है
और दुःख दफनाने को
पर क्या करूं दोस्तों !
इस बंजर भूमि में
खुद ही हैरान हूँ मैं आज
अपनी बनाई हुयी कब्र देख कर
कहीं सूख की तलाश में
खुद ही कब्र न बन जाऊं एक दिन |

पसीना भी इत्र लगे

1990

अच्छा तो लगता है
बैठ जाने को मन करता है
बरगद की छांव में
पर कड़ी धूप जब नियति बन जाती है
तब धूप में ही
मन - पुष्प खिलने लगता है
पसीने की खुशबू
इत्र सी मादक लगने लगती है
आत्म - मुग्ध सा मन
बस चलता रहता है |

गांठ बांध कर आयी

09 .07.12  

गांठ बांध कर आती है
जिस आदमी से औरत
उसके साये तले
उसके घर में
रहती है आजीवन |
उस आदमी के न रहने पर
औरत ढूंढती है
दूसरा सहारा पुत्र या किसी दुसरे रिश्ते में
कितनी बेबस है वह
क्यों रखते हैं हम
उसे साये के अभ्यस्त
क्या उसकी अपनी क्रांति ही
निकाल कर लायेगी साये से बाहर उसे
और खड़ा करेगी पुरुष के बगल ?
समाज क्या उसे यह कदम उठाने देगा ?
कितनी जटिल समस्या है यह !

मृत्यु सकून है |

मोह भंग होने पर
मृत्यु
बड़ी ठंडी होती है
कभी कभी सोंचता है मन
स्थूल वस्तुओं के प्रति मोह न हो तो
कष्ट न हो शरीर छोड़ते वक्त
औलाद में जीने की मंशा
कभी न रखे जो
वो निरुद्विग्न निर्विकार सा चला जाता है जग छोड़
अपनों को बहुत कुछ दे कर |

ओ पुत्र !

पुत्र मेरे !
माँ तेरी मैं
कैसे भूला तू मुझे ?
विधवाश्रम में बैठे बैठे
यूँ ही याद आया मुझे तेरा बचपन
निज भविष्य सुघड़ बनाने हेतु
माता का ऋण कैसे भूला तू
जी लेती तेरे घर में
तो श्री हीन हो जाता तेरा घर क्या ?
मेरा भोजन , मेरी चिकित्सा , मेरा परिधान
क्या इतना महंगा था कि
मुझ पर न खर्च कर पाया तू ?
हंस ही लेती तेरे संग
ढूंढती तेरा बचपन
तेरी औलाद में
इतनी खुशी भी
तू न दे पाया ?



बुधवार, 4 सितंबर 2013

आजादी मिल कर रहेगी

! पुरुष
देश को आजादी मिली
तुम आजाद हो गये पर स्त्री  नहीं
अफ़सोस में है मन .....
निज सम्मान , स्वतंत्रता , समानता के लिए स्वजन से युद्ध !
आज युद्ध अवश्यम्भावी लग रहा है .....
घर घर में हो कर रहेगा निकट भविष्य में महाभारत
चेतना की लड़ी बिछी है हर घर में
चिंगारी लगने भर की देर है
कांप उठेगा आकाश
जब यह फूटना शुरू हो जायेगी
आखिर कितने दिनों तक रिश्तों का नाम दे
करोगे स्त्री का शोषण |

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

खुशियों के पल

पकड़ा है मैंने
मान अपमान भूल कुछ निज खुशियों के पल
गट्ठर में बांध रखा है इन्हें
जीवल के घटाटोप अंधकार में
पता नहीं कैसे ये पल स्वयं निकल जाते हैं
और जगमगाने लगते हैं
आकाश में सितारों सरीखे
बातें करने लगते हैं मुझसे
रोशन कर जाते हैं
मेरा अँधेरा मन |