मंगलवार, 14 अगस्त 2012

शिक्षक जी


आपकी नैतिकता का पाठ
शिक्षक जी
विद्यालय में ही
पाए शोभा
जिंदगी में नहीं |

जिंदगी भर के
परिश्रम से
एक घर ठोंक सके
शिक्षक महोदय आप
देखो दिहाड़ी मजदूर ने
ठोंका घर
चाहे जैसे भी
यह सोंचने का विषय नहीं आपका |

सोमवार, 13 अगस्त 2012

हाइकू - 21


राज्य क्यूँ बांटें
जनसँख्या घटाएं
हम अपनी |

ललकारा है
ईमान को तुमने
अब फल ले |

मैं हूँ सवार  
आज समय पर
न पुकार तू |

सम्हलो तो
बिगड़ैल घोड़ा सा
वक्त पटके |

पन्द्रह अगस्त




इंतज़ार है
पन्द्रह अगस्त का
जब लगेगी प्रभात फेरी बच्चों की |
हम घबरा कर
उस दिन निकलेंगे
बिस्तर से सबेरे सबेरे |
बच्चों का जूनून
देख
दिल हुलस उठेगा |
जल्दी जल्दी नहा धो कर
बैठना होगा
दूरदर्शन के सामने |
तिरंगा
फहराना होगा
घर के छत पे |

बुधवार, 8 अगस्त 2012

हाईकू - 20


बादल आया
संग बारिश लाया
मन हरसे |

रंगीन पंख
लगा उड़े चेतना
मुक्त नभ में |

ये कैसा  देश
कहाँ पहुँची मैं 
मन हैरान !

इन्द्रधनुष
ने छटा बिखेरी है
मैं मंत्रमुग्ध |

हाईकू - 19





      प्रेम              



प्रेम है इत्र
छिडकें खुद पर
सम्भ्रांत लोग |

मान ले प्रेम
को धूरी जीवन की
सुखी होगा तू |

सुखद छाँव
तपते जीवन की 
प्रेम ही है |

प्रेम कुछ है
सब कुछ तो नही
न भूल कर्म |

जीवन संध्या


ज्यों ज्यों शाम गहराने लगती है
लोगों को एक एक कर मिलने आते देख
मन कोने में दुबक जाता है
और बुद्धि सजग हो जाती है |
वे अतिथि ले जाते हैं
चेतना को अतीत में
और घर के सामने के वृक्ष
लुप्त होने लगते हैं |
..........
..........
सड़क पर
आने जाने वाली गाडियां
घड़ी बन
दिखाने लगती हैं समय |
मेहमान पल भर में
गायब होने लगते हैं एक एक कर
चलना चाहिए घर के अंदर
बुद्धि कह उठती है |
अंदर जाते ही
कमरे में रेडियो चहक उठता है
और मन को  साथ गुनगुनाते देख
चारों ओर गुनगुनी धूप फ़ैल जाती है रात में |

लड़की का आसमान


सबेरे हाफ पैंट टी शर्ट में
सेहत बनाती लड़कियां
सच में जीती हैं जिंदगी
और उनके अंदर की आग
देती है उन्हें आत्मनिर्भरता |
कल्पना चावला बन
जिंदगी की
उंचाईयों को छू
हर संकीर्णता को
पांव तले रौंदने का सत्साहस |
आखिर वे भी तो
बेटियां हैं न
वे हवा  की खुशबू
सूंघ सकती हैं
तो हमारी बेटी क्यों नहीं ?
हमने बेटी को
मात्र दान की वस्तु बना
उसके हिस्से का आसमान
बेटे को सौंप रक्खा है
आखिर क्यों ?
क्या हमारी यह अकर्मण्यता नहीं
जो जेवरों से लाद हमने उसे
सुरक्षित रखा है
घर की चाहरदीवारी में ?
आखिर क्यूँ है
हमारी यह प्रवृति
रोबोट बना उसे
उसके वजूद को
नकारने की चाल तो नहीं ?
मातृत्व के नाम पर
घर में बांधना क्यूँ
मैं यह सोंचू आज
क्या मुक्केबाज मेरी कॉम
माँ नहीं ?
..........
छोटा सा प्रश्न
आप से
अपनी बेटी का आसमान
बांध
सागर में
तो नहीं डाल दिया ?