शुक्रवार, 27 जून 2025

मां का मन कहे


 

 

बेटा मेरा है 


 उसका परिवार मेरा है


 वो

 

क्यों खर्च करता है अपनी ब्याहता बहन पर

 

समझना चाहिए उसे

 

बहन अब दूसरे घर की सदस्य है

 

अपने सुख दुःख बह को खुद झेलना है ।

 

बुधवार, 18 जून 2025

ये कैसा मान महिला का





ड्राइंग रूम और पार्टियों के मुद्दे होते महिला दिवस 
फिर 
अपने घर में सो जाती हैं ...... बिला जाती हैं आम औरतें ........... 
घर में 
पिता को नहीं भाती समानता अपने बेटे से 
अपनी ही बेटी की 
माता को न महसूसता दर्द अपनी बेटी का 
तो कैसा महिला दिवस 
और 
कैसा मान महिला का ........ 
अरे ! 
अपाहिज बना दिया है तुमने बेटी को आरक्षण दे के ....... 
तुमने उसे महसूस कराया है ........ विश्वास दिलाया है 
कि 
वह दुर्बल है ....... 
वर्ना
वह भी खूब समझती है दुर्बलता पुरुषों की 
जो राज करता है 
औरत की दया ... करुणा के बल पे ...... 
और 
शोषण करता है 
अपनी निकटस्थ कमजोर स्त्री संबंधी का ।

मैं अपना भाग्य विधाता हूं ।



15 August 2015
00:51



आजादी का जश्न मनाते वक्त 
याद आये 
मुझे 
मेरे जन्मदाता 
जिनके 
त्यागपूर्ण जीवन के बल पे 
सदा जलती रही 
कुछ कर गुजरने की लौ 
मेरे मन में .......
आज 
इस सम्मानजनक समाज में 
क्यूं न याद करूं मैं 
अपना ...........आर्थिक अभाव ........
बदली मैंने अपनी किस्मत 
अपने छोटे छोटे हाथों से ......
आज खोली जो मुट्ठी मैंने अपने अंधेरे कमरे में 
तो 
रोशन हो गया .......
मेरा कमरा .........मेरा जहाँ ........
मैं अपना भाग्य विधाता हूं |

शनिवार, 14 जून 2025

गोल्ड डिगर








बेटे को हक है 

अशक्त  उम्रदराज मां को चार बातें सुनने का 

और 

मां का फर्ज है अपने कमाऊ बेटे के बोल सुनने का .... 


आखिर 

वो बेटोंवली विधवा है ।


आज मैं सोचूं 

समय रहते मां ने पुनर्विवाह कर लिया होता 

तो 

शायद अच्छी जिंदगी होती 

इस मां की 

कम से कम गोल्ड डिगर 

 न कहलाती मां।

सोमवार, 9 जून 2025

कर्तव्य बोध

 

 

 

 

ससुराल अपना है

 

मैके के प्रति कर्तव्य बोध है

 

कर्तव्य बोध लिए जीवित रहे

 

मैंका मिट गया

 

यह कैसा  बोध था

 

जो

 

सदा तड़पता रहा .....

 

अज्ञानी ही भले थे ।

बुधवार, 21 मई 2025

अज्ञानता

 

 

 Date 5 फरवरी 2025

 

री लड़की !

 

कहाँ से सीखा भूलना जड़ें

 

अज्ञानता अपना संविधान की ....

 

पैरासाइट बनना

 

अपने मर्द के मिट्टी में मिलते ही

 

एक दिन   


तू अपनी पहचान खो देगी ।

निकल पड़

An two year old poem


 

 

  

 

 

 

आपका नाम ले कर पुकारने लगे

 

जब आपकी औलाद

 

तब

 

समझ लीजिये

 

वह

 

अब आपके रिश्ते को नहीं मान देता

 

निकल पड़ इंसान

 

अब इस घर को तेरी ज़रूरत रही

 

लौट अब

 

अपने जन्मस्थान की ओर

 

क्यों पुकारती तू

 

ईश्वर मूर्ति में नहीं है

 

मंदिर में नहीं है

 

वह

 

तुझमें है

 

मान रख अपना ।