शनिवार, 5 अप्रैल 2025

हक़ के संग रिश्ते ख़त्म

  

 


 

 

पैतृक संपत्ति ने बांध के रखा था

 

भाई बहन को

 

मकान की मरम्मत जरूरी थी

 

बहन ने हक त्यागा

 

उसे एक साड़ी और मिठाई मिली लौटते वक्त

 

उम्र बढ़ गई थी बहन की

 

साड़ी बाँधना मुश्किल था

 

डाइबिटीज से पीड़ित बहन ने अपनी मिठाई और साड़ी कामवाली को दे दी

 

हक खत्म हुआ

 

रिश्ते बिखर गये


मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

दुःख की लड़ी



#इन्दु_बाला_सिंह


बेटी ने अपनी असफलता का ठीकरा माँ पर फोड़ा 


बेटे ने अपनी पारिवारिक वैमन्ष्य का जिम्मेवार माँ को बताया 


माँ हाउस वाइफ ही रही 


होम मेकर न कहला पाई 


पति के लिये पत्नी बच्चे पैदा करनेवाली और कामवाली थी 


आख़िर कितना ज़िम्मा उठाना पड़ता था पति को 


अब गाँव नहीं कि घर के काम ज़्यादा थे 


शहर में रहती थी माँ 


सुविधाभोगी कहलायी सदा 


ख़ुद लड़ झगड़ के कमाने न निकल पड़ी 


पति के गुज़रने पर माँ अकेली हो गई 


और 


माँ के गुज़रने पर बेटा 


बेटी तो ब्याहता थी 


आबाद रही 


पर 


वह भी कमाऊ न बनी 


दुःख की लड़ी न काटी बेटी ने भी ।



फ़क़ीर महिला



#इन्दु_बाला_सिंह


लड़की 


बचपन में पिता के दान पर पली 


बड़ी हुई तो बोझ बनी 


दान की गयी 


पर पुरुष को 


अब यहाँ अहसान और दान का खा रही थी वह 


वृद्धावस्था में बेटा के दान का खाने लगी .…


बेटी खुद दान का खा रही थी 


वह दान देने के काबिल ही नहीं थी 


लड़कियाँ फ़क़ीर होतीं हैं 


भटकती रहतीं हैं 


अन्न के लिये ।



शुक्रवार, 28 मार्च 2025

ओ री चिड़िया रानी



चीं चीं !


गौरैया दिवस के दिन 


कहाँ थी तुम 


कितना ढूँढी थी मैं पार्क में तुम्हें 


पर


तुम बालू पर फुदकती नजर न आयी 


सुन रही थी


 तुम्हारी चहचहाट पेड़ों में 


नीचे न उतरी तुम 


तुम भी अपना दिवस मना रही थी क्या 


खींचना चाहती थी तुम्हारी फोटो ……


आज तीन दिन बाद 


फुदकती नजर आयी हो  तुम बालू पर 


नाराज हूँ मैं तुमसे 


ओ री ! चीं चीं 



शनिवार, 22 मार्च 2025

घर कहाँ है

  

 

 


 

 

प्रतिदिन घर से दूर जाती थी

 

और लौटती घर

 

पर घर तो मेरा था ही नही

 

वह तो मेरे बच्चों का था

 

सुरक्षित रहते थे वे घर में पढ़ते लिखते थे

 

स्कूल भी स्कूल से भेजे बस से चले जाते थे और लौट आते थे

 

बच्चे बड़े हुये

 

चले गये अपना घर बनाने

 

और

 

मैं दूसरों के घरों की महसूस कर रही हूँ गर्माहट

 

अपने घर के अभाव में घर के ज़्यादा याद आती है


गुरुवार, 20 मार्च 2025

कविता का जन्म



छटपटाहट होती है 


बेचैन होता है मन


कोई श्रोता नहीं 


तो बहते हैं भाव कविता के रूप में 


मन खाली हो जाता है 


कविता की नाल कट जाती है ।



बुधवार, 12 मार्च 2025

हमारा घर

11/03/25

 

 

 

 

मिले

 

बैठे

 

बतियाये

 

बिखर गये

 

अपने अपने शहर में

 

कमाने खाने

 

मिलने के स्थान बदल सकते हैं

 

हम नहीं